Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1475

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ नो꣢ म꣣न्द्रा꣡भि꣢रध्व꣣रे꣢ जि꣣ह्वा꣡भि꣢र्यजा म꣣हः꣢ । आ꣢ दे꣣वा꣡न्व꣢क्षि꣣ य꣡क्षि꣢ च ॥१४७५॥

सः꣢ । नः꣣ । मन्द्रा꣡भिः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । जि꣣ह्वा꣡भिः꣢ । य꣣ज । महः꣢ । आ । दे꣣वा꣢न् । व꣣क्षि । य꣡क्षि꣢꣯ । च꣣ ॥१४७५॥

Mantra without Swara
स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः । आ देवान्वक्षि यक्षि च ॥

सः । नः । मन्द्राभिः । अध्वरे । जिह्वाभिः । यज । महः । आ । देवान् । वक्षि । यक्षि । च ॥१४७५॥

Samveda - Mantra Number : 1475
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सः) वह अग्नि (नः) हमारे (अध्वरे) यज्ञ में (मन्द्राभिः) हव्य पदार्थों के संसर्ग से हर्षकारी (जिह्वाभिः) लपटों से (महः) बड़े भारी (देवान्) वायु आदि देवों का (यज) यजन करे क्योंकि अग्नि ही देवदूत होने से देवों का (आवक्षि) आवाहन करता (च) और (यक्षि) यजन करता है॥
कोई लोग सूर्य के किरणों के रंगों के समान अग्नि की लपटों में भी ७ अवस्था मानकर ७ नाम धरते हैं कि:—
१—काली = श्याम
२— काराली = असह्यवर्णा।
३— मनोजवा=मन के समान अत्यन्त चञ्चल।
४— सुलोहिता = पूरी सुर्ख।
५— सुधूम्रवर्णा = धुंधली।
६— स्फुलिंगिनी = चिनगारियों वाली।
७— विश्वरूपा – सब रूपों वाली मिली हुई।
श्री सत्यव्रत सामश्रमी अपनी टिप्पणी में “लीला” नाम आठवीं भी लिखते हैं॥
Footnote
ऋ० ६। १६। २ में भी॥