Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1473

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशनाः काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शु꣣ष्मी꣢꣫ शर्धो꣣ न꣡ मारु꣢꣯तं पव꣣स्वा꣡न꣢भिशस्ता दि꣣व्या꣢꣫ यथा꣣ वि꣢ट् । आ꣢पो꣣ न꣢ म꣣क्षू꣡ सु꣢म꣣ति꣡र्भ꣢वा नः स꣣ह꣡स्रा꣢प्साः पृतना꣣षा꣢꣫ण् न य꣣ज्ञः꣢ ॥१४७३॥

शुष्मी꣢ । श꣡र्धः꣢꣯ । न । मा꣡रु꣢꣯तम् । प꣣वस्व । अ꣡न꣢꣯भिशस्ता । अन् । अ꣣भिशस्ता । दिव्या꣢ । य꣡था꣢꣯ । विट् । आ꣡पः꣢꣯ । न । म꣣क्षु꣢ । सु꣣मतिः꣢ । सु꣣ । मतिः꣢ । भ꣣व । नः । सहस्रा꣡प्साः꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢ । अ꣣प्साः । पृतनाषा꣢ट् । न । य꣣ज्ञः꣢ ॥१४७३॥

Mantra without Swara
शुष्मी शर्धो न मारुतं पवस्वानभिशस्ता दिव्या यथा विट् । आपो न मक्षू सुमतिर्भवा नः सहस्राप्साः पृतनाषाण् न यज्ञः ॥

शुष्मी । शर्धः । न । मारुतम् । पवस्व । अनभिशस्ता । अन् । अभिशस्ता । दिव्या । यथा । विट् । आपः । न । मक्षु । सुमतिः । सु । मतिः । भव । नः । सहस्राप्साः । सहस्र । अप्साः । पृतनाषाट् । न । यज्ञः ॥१४७३॥

Samveda - Mantra Number : 1473
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(शुष्मी) बलवान् सोम (मारुतं शर्धः न) वायुओं के बल = वेग के समान (पवस्व) शुद्धि करे (यथा) जिससे (दिव्या विट्) देवतों के वैश्य = मरुद्गण [सायणाचार्य कहते है कि “मरुत् देवों के वैश्य हैं” यह ब्राह्मण में लिखा है] (अनभिशस्ता) उत्तम अनिन्द्य प्रशस्त हो, (आप न) जलों के समान (नः) हमारे लिये (मक्षु) शीघ्र (सुमतिः) सुन्दर बुद्धि तत्व वाला (भव) हो, (सहस्राप्साः) बहुत रूपों वाला (पृतनाषाड्) सेनाओं में सहनशक्ति का देने वाला (न) जैसे (यज्ञः) अनेक प्रकार से उपकारक है, वैसे अनेक प्रकार का उपकार करने वाला सोम भी हो॥
सोम का सेवन करने वाले बलवान् हो जाते हैं, इस से सोम का विशेषण (शुष्मी) बलवान् रक्खा है, सोमसेवी लोग बुद्धिमान् भी हो जाते हैं अतः उसको (सुमतिः) उत्तम बुद्धिमान् कहा है। जैसे जल से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है वैसे सोम को भी शान्तिदायक कहने के लिये जल का दृष्टान्त उपयोगी है। और जैसे अनुष्ठान किया हुआ यज्ञ अनेक प्रकार उपकारक है, वैसे ही सेवन और होम किया हुआ सोम भी अनेक रूप से उपकारक होता है इससे यज्ञ की उपमा कही गई। विशेष कर क्षात्रधर्म का उपयोगी होने से सोम को (पृतनाषाड्) सेना की उपयुक्त सहनशक्ति का दाता बताया गया है॥ सायणाचार्योद्धृत ब्राह्मण का प्रमाण संस्कृतभाष्य मैं देखिये॥
Footnote
ऋ० ९। ८८। ७ में भी॥