Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1472

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशनाः काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स꣢ ई꣣ꣳ र꣢थो꣣ न꣡ भु꣢रि꣣षा꣡ड꣢योजि म꣣हः꣢ पु꣣रू꣡णि꣢ सा꣣त꣢ये꣣ व꣡सू꣢नि । आ꣢दीं꣣ वि꣡श्वा꣢ नहु꣣꣬ष्या꣢꣯णि जा꣣ता꣡ स्व꣢र्षाता꣣ व꣡न꣢ ऊ꣣र्ध्वा꣡ न꣢वन्त ॥१४७२॥

सः । ई꣣म् । र꣡थः꣢꣯ । न । भु꣣रिषा꣢ट् । अ꣣योजि । महः꣢ । पु꣣रू꣡णि꣢ । सा꣣त꣡ये꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । आत् । ई꣣म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । न꣣हुष्या꣢णि । जा꣣ता꣢ । स्व꣡र्षा꣢ता । स्वः꣡ । सा꣣ता । व꣡ने꣢꣯ । ऊ꣣र्ध्वा꣡ । न꣣वन्त ॥१४७२॥

Mantra without Swara
स ईꣳ रथो न भुरिषाडयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि । आदीं विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्ध्वा नवन्त ॥

सः । ईम् । रथः । न । भुरिषाट् । अयोजि । महः । पुरूणि । सातये । वसूनि । आत् । ईम् । विश्वा । नहुष्याणि । जाता । स्वर्षाता । स्वः । साता । वने । ऊर्ध्वा । नवन्त ॥१४७२॥

Samveda - Mantra Number : 1472
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(महः) महान् (रथः) रथ (न) सा, रक्षक (सः) वह (ईम्) ही, सोम (वने) संग्रामस्थल [मैदान] में (भूरिषाट्) बहुत सहनशक्तिदायक है, अतः (अयोजि) प्रयुक्त = सेवित किया जाता है। किस लिये ? उत्तर — (पुरूणि) बहुत (वसूनि) युद्धलभ्य धनों को (सातये) देने लिये। (आत्, ईम्) अनन्तर (विश्वा) सब (नहुष्याणि) मानुष (जाता) उत्पन्न हुए (ऊर्ध्वा) ऊंचे = भारी (स्वर्षाता) क्षात्रधर्मोचित युद्ध करने वाले योद्धाओं को स्वर्गप्रद संग्राम (नवन्त) संगत होते हैं।
पूर्व मन्त्र में राजा को सोम का उत्पादन, रक्षा, अभिषव और पान का उपदेश था, इस मन्त्र में उसका प्रयोजन वा फल कहा है कि सोम संग्राम में एक बड़े भारी रथ के समान रक्षक है, उसके प्रयोग (सेवन) से चोट के सहने की शक्ति बढ़ती है, जिससे संग्रामों में विजयपूर्वक बहुत धनों की प्राप्ति होती है और मनुष्यों के सब उत्पन्न हुए संग्राम, जो क्षात्रधर्मानुसार हों तो स्वर्गदायक हैं, संगत = सार्थक होते हैं॥
Footnote
निघण्टु २। ३॥ २। १४ के प्रमाण और सायरणाचार्य का संमतत्व संस्कृत भाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ९। ८८। २ में भी॥