Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1470

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
के꣣तुं꣢ कृ꣣ण्व꣡न्न꣢के꣣त꣢वे꣣ पे꣡शो꣢ मर्या अपे꣣श꣡से꣢ । स꣢मु꣣ष꣡द्भि꣢रजायथाः ॥१४७०॥

के꣣तु꣢म् । कृ꣣ण्व꣢न् । अ꣣केत꣡वे꣢ । अ꣣ । केत꣡वे꣢ । पे꣡शः꣢꣯ । म꣣र्याः । अपेश꣡से꣢ । अ꣣ । पेश꣡से꣣ । सम् । उ꣣ष꣡द्भिः꣢ । अ꣣जायथाः ॥१४७०॥

Mantra without Swara
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ॥

केतुम् । कृण्वन् । अकेतवे । अ । केतवे । पेशः । मर्याः । अपेशसे । अ । पेशसे । सम् । उषद्भिः । अजायथाः ॥१४७०॥

Samveda - Mantra Number : 1470
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मर्याः) हे मनुष्यो ! (अकेतवे) प्रज्ञानरहित रात्रि में सोये हुए प्राणिवर्ग के लिये (केतुम्) प्रज्ञान (कृण्वन्) करता हुआ और (अपेशसे) रूपरहित पदार्थ के लिये (पेशः) रूप करता हुआ यह सूर्य (उषद्भिः) दाहक किरणों से (सम् अजायथाः) उदय होता है।
Footnote
निघण्टु ३। ७ व ९ के प्रमाण संस्कृत भाष्य में देखिये। सूर्य से ही प्रज्ञा का उद्बोधन होता है और सूर्य से ही उस-उस पदार्थ का रूपवान् पना है, सूर्य ही जब प्रातः उदय होता है तब प्रत्येक पदार्थ के रूप की भावना कराता है। वास्तव में सब रूप रंगों की उत्पत्ति ही सूर्य से है। यह मन्त्र में परमात्मा का मनुष्यों के प्रति उपदेश है॥
ऋ० १।६।३ और यजुः २९। ३७ में भी॥