Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 147

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢꣫त्राह꣣ गो꣡र꣢मन्वत꣣ ना꣢म꣣ त्व꣡ष्टु꣢रपी꣣꣬च्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ च꣣न्द्र꣡म꣢सो गृ꣣हे꣢ ॥१४७॥

अ꣡त्र꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । गोः । अ꣣मन्वत । ना꣡म꣢꣯ । त्व꣡ष्टुः꣢꣯ । अ꣣पीच्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ । च꣣न्द्र꣡म꣢सः । च꣣न्द्र꣢ । म꣣सः । गृहे꣢ ॥१४७॥

Mantra without Swara
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥

अत्र । अह । गोः । अमन्वत । नाम । त्वष्टुः । अपीच्यम् । इत्था । चन्द्रमसः । चन्द्र । मसः । गृहे ॥१४७॥

Samveda - Mantra Number : 147
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अत्र) इस (चन्द्रमसः, गृहे) चन्द्रमा के मण्डल में (त्वष्टुः) सूर्य की (गोः) किरण का (नाम ह) स्वरूप ही है (इत्था) इस प्रकार (अमन्वत) मानो॥
अर्थात् परमेश्वर का उपदेश है कि हे मनुष्यो ! सूर्य की किरण चन्द्रमा को प्रकाशित करती है। यह जानो तथा मानो॥
इस मन्त्र में ‘त्वष्टा’ पद का अर्थ सूर्य है और परमेश्वर्य वाला होने से सूर्य भी इन्द्रपदवाच्य है। त्वष्टुः का अर्थ सूर्य करने में निरुक्तकार ने ॠग्वेद की ऋचा का प्रमाण देकर कहा है कि /;त्वष्टा पुत्री का ले जाना करता है और इस सब जगत् में व्यापता है और ये सब भूतमात्र का समागम करते हैं। (यम) दिन की माता (उषा) ले जायी जाती है बड़े विवस्वान् की जाया अदृष्ट होती है अर्थात् आदित्य की जाया रात्रि आदित्य के उदय पर छिप जाती है” यह निरुक्त के पाठ का भाषार्थ है जो निरुक्तकार ने “त्वष्टा दुहित्रे” इत्यादि ऋग्वेद १०।१७।१ की ऋचा का व्याख्यान किया है॥
गोशब्द से सूर्य की किरण अर्थ लेने में निरुक्तकार कहते हैं कि “और इसकी एक किरणें चन्द्रमा की ओर प्रकाश करती हैं और इससे उपेक्षा करनी चाहिये। आदित्य से इस [चन्द्रमा] का प्रकाश होता है जैसा कि सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः, यह वेदवाक्य है। इसलिये किरण भी गौ कही जाती है। अत्रा ह गोरमन्वत इस मन्त्र पर आगे (४।२५ में) व्याख्या करेंगे। सब ही किरणें गौ कही जाती हैं” यह निरुक्तस्थ पाठ का भाषार्थ है।
Footnote
ऋग्वेद १।८४।१५ में भी ऐसा ही पाठ हैं जिस पर निरुक्तकार ने सूर्य की छिपी हुई वा प्रतिगत किरण चन्द्रमण्डल पर पड़ती हैं, यह लिखा है॥
प्रायः इस प्रकार के व्याख्यानों पर लोगों को भ्रम हुआ करता है कि व्याख्याता ने वेद के विज्ञान की प्रशंसार्थ पक्षपात से खेंचतान करके वर्त्तमान काल में प्रसिद्ध हुए विज्ञान की बातें वेद में घुसेड़ दी हैं। परन्तु उन संशयात्माओं को इससे शान्ति मिलेगी कि आजकल के वैज्ञानिकों के जन्म से बहुत वर्ष पूर्व यास्कमुनि ने ऊपर लिखा सिद्धान्त कहाँ से निकाला ? वेद से। क्योंकि निरुक्तकार अपने मत में “सुषुम्णः सूर्य्यं रश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः” इस वेदवचन का प्रमाण देते हैं।
इसमें तो सायणाचार्य ने भी स्पष्ट स्वीकार किया है कि “चन्द्रबिम्ब में सूर्य की किरणें प्रतिफलित होती हैं” इत्यादि॥
तथा एसियाटिक सोसाइटी के सुयोग्य सभ्य पं० सत्यव्रत सामश्रमी जी अपनी टिप्पणी में विवरणकार का मत लिखते हैं कि—“गो शब्द से यहाँ सुषुम्ना नाम सूर्य की किरण लेनी चाहिये जो चन्द्रमण्डल के छोटा होने चन्द्रमण्डल पर जाकर लौट कर पृथिवी पर चान्दनी के रूप से प्रकाश करती हैं, यही यहाँ गो शब्द से अभिप्राय है”।
अष्टाध्यायी ६।३।१३६॥ ५।३।१११ निरुक्त १२।११॥ २। ६। ४। २५ ऋग्वेद १०।१७।१ सायणभाष्य और श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी की टिप्पणी इन सब का याथातथ्य पाठ संस्कृतभाष्य में देखिये॥