Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1469

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣ञ्ज꣡न्त्य꣢स्य꣣ का꣢म्या꣣ ह꣢री꣣ वि꣡प꣢क्षसा꣣ र꣡थे꣢ । शो꣡णा꣢ धृ꣣ष्णू꣢ नृ꣣वा꣡ह꣢सा ॥१४६९॥

यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ । अ꣣स्य । का꣡म्या꣢꣯ । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । वि꣡प꣢꣯क्षसा । वि । प꣣क्षसा । र꣡थे꣢꣯ । शो꣡णा꣢꣯ । धृ꣣ष्णू꣡इति꣢ । नृ꣣वा꣡ह꣢सा । नृ꣣ । वा꣡ह꣢꣯सा ॥१४६९॥

Mantra without Swara
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे । शोणा धृष्णू नृवाहसा ॥

युञ्जन्ति । अस्य । काम्या । हरीइति । विपक्षसा । वि । पक्षसा । रथे । शोणा । धृष्णूइति । नृवाहसा । नृ । वाहसा ॥१४६९॥

Samveda - Mantra Number : 1469
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस [अग्नि और उसके कार्य पदार्थों में उस—उस रूप को प्राप्त] सूर्य के (रथे) रमणीय गोले में वर्त्तमान (काम्या) कामना करने योग्य (विपक्षसा) विविध ७ रंगे पार्श्व जिनमें हैं, तो भी (शोणा) रक्तवर्णं प्रतीत होने वाले (घष्णू) न सहारे जाने वाले (नुवाहसा) मनुष्यादि प्राणियों के धारक होकर बहने वाले (हरी) शोषक होने से हरण करने वाले सीधे तिरछे दो प्रकार के किरणों को (युञ्जन्ति) पृथिव्यादि लोक जो सूर्य के चारों ओर वर्त्तमान हैं, अपने में युक्त करते हैं॥
Footnote
ऋग्वेद १। ६। २ और यजुः २३। ६ में भी॥