Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1468

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ ब्र꣣ध्न꣡म꣢रु꣣षं꣡ चर꣢꣯न्तं꣣ प꣡रि꣢ त꣣स्थु꣡षः꣢ । रो꣡च꣢न्ते रोच꣣ना꣢ दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥

यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ । ब्र꣣ध्न꣢म् । अ꣣रुष꣢म् । च꣡र꣢न्तम् । प꣡रि꣢꣯ । त꣣स्थु꣢षः꣢ । रो꣡च꣢꣯न्ते । रो꣣चना꣢ । दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥

Mantra without Swara
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥

युञ्जन्ति । ब्रध्नम् । अरुषम् । चरन्तम् । परि । तस्थुषः । रोचन्ते । रोचना । दिवि ॥१४६८॥

Samveda - Mantra Number : 1468
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(परि) चारों ओर (तस्थुषः) स्थित (रोचनाः) प्रकाशमान लोक लोकान्तर (ब्रध्नम्) सूर्य और (अरुषम्) सूर्याश्रित अग्नि तथा (चरन्तम्) अग्न्याश्रित चलने वाले वायु को (युञ्जन्ति) आपे में जोड़ते हैं, तब (दिवि) अन्तरिक्ष में (रोचन्ते) प्रकाशते हैं।
इन्द्र का इन्द्रत्व परमैश्वर्य के योग से है और सूर्य अग्नि वायु रूप से अवस्थान परमेश्वर्य है। इसलिये यहां इन्द्र की ही प्रशंसा है क्योंकि इन्द्र ही इस ऋचा का देवता है। इसलिये यहां ब्रघ्न शब्द से सूर्य, अरुष से अग्नि और चरन् से वायु का ग्रहण है। तथा च सायणाचार्य ने भी लिखा है कि “उक्तार्थपरक ही इस मन्त्र का व्याख्यान ब्राह्मणान्तर में भी है कि—युञ्जन्ति ब्रघ्नम्० से सूर्य को, अरुषम् ० से अग्नि को, और चरन्तम्० से वायु को युक्त करना तात्पर्य है, परितस्थुषः — से इन गगनमण्डल में दृश्यमान लोकलोकान्तरों का तात्पर्य है। रोचन्ते रोचना दिवि — से नक्षत्रों के प्रकाशन का तात्पर्य है।”
भाव यह हुआ कि सूर्य के चारों ओर वर्तमान पृथिवी चन्द्रमा आदि लोकलोकान्तर सूर्य के तेज से चमकते हैं। ऐसा ही मन्त्र यजुर्वेद अ० २३ में ५वां है, उस का भाष्य करते हुए महीधर ने भी लिखा है कि “प्रकाशित चन्द्र ग्रह तारा आदि सूर्य के तेज से चमकते हैं” फिर महीधर अपने कथन की पुष्टि में कहते हैं कि ज्योति शास्त्र में भी कहा है कि “तेजों का गोला सूर्य है और अन्य नक्षत्रादि अम्बुगोलक हैं”, [स्वयंप्रकाश नहीं हैं] ऋग्वेद १। ६। १ में भी॥
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