Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1462

1875 Mantra
Devata- सविता Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡त्स꣢वि꣣तु꣡र्व꣢꣯रेण्यं꣣ भ꣡र्गो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ धीमहि । धि꣢यो꣣ यो꣡ नः꣢ प्रचो꣣द꣡या꣢त् ॥१४६२॥

त꣢त् । स꣣वितुः꣢ । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । भ꣡र्गः꣢꣯ । दे꣣व꣡स्य꣢ । धी꣣महि । धि꣡यः꣢꣯ । यः । नः꣣ । प्रचोद꣡या꣢त् । प्र꣣ । चोद꣡या꣢त् ॥१४६२॥

Mantra without Swara
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

तत् । सवितुः । वरेण्यम् । भर्गः । देवस्य । धीमहि । धियः । यः । नः । प्रचोदयात् । प्र । चोदयात् ॥१४६२॥

Samveda - Mantra Number : 1462
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हम उपासक लोग उस (सवितुः) सर्वोत्पादक सर्वपिता (देवस्य) प्रकाशमान ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर के (तत्) उस अनिर्वचनीय (वरेण्यम्) वरणीय—भजनीय (भर्गः) तेज का (धीमहि) ध्यान करते हैं (यः) जो परमेश्वर (नः) हमारी (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) अत्यन्त प्रेरित करे॥
अर्थात् जो सर्व जगदुत्पादक सर्वपिता सविता देव ज्योतिःस्वरूप परमात्मा हमारी धर्मादिविषयक बुद्धियों को भले प्रकार प्रेरित करे उस जगदीश्वर के भजनीय और भर्गः = अविद्यादि दुःखदायक विघ्नों के भून डालने वाले ज्ञानस्वरूप का हम ध्यान करते हैं।
अथवा — (यः) जो सूर्य (नः) हमारी (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) प्रेरित करता है उस (सवितुः) ओषधि वनस्पत्यादि सब प्राणी जगत् की उत्पत्ति के निमित्तभूत (देवस्य) प्रकाशमान सूर्य के (तत्) उस अनिर्वचनीय इयत्ता से जानने में न आने वाले (वरेण्यम्) सेवनीय (भर्गः) दुर्गन्धादि जनित दुष्ट जन्तु रोगकारकों के भून डालने वाले [धूप] को हम (धीमहि) धारण करते हैं।
सूर्य की धूप के सेवन से दुर्गन्धादि दोष दूर होकर नैरोग्यादि की वृद्धि होती है और उसकी धूप तथा प्रकाश से निद्रा आलस्यादि तमोगुण के कार्यों का नाश होकर मनुष्यों की बुद्धियें फुरती हैं। हमको यह सब जानकर सूर्य की धूप का विधिवत् सेवन करके उपकार ग्रहण करना चाहिये॥
यद्वा – भर्गः शब्द से अन्न का ग्रहण जानिये। सूर्य द्वारा वर्षा और यवगोधूमादि औषधि और वट पिप्पलादि वनस्पति उगते हैं। जिनसे अन्न होता है। इस लिये भी सूर्यजनित अन्न का विधिपूर्वक धारण सेवन करना इस मन्त्र का उपदेश है। सायणाचार्य ने भर्गः पद से अन्न अर्थ लेने में एक आथर्वणिकों का मत उद्धृत किया है जो हमने संस्कृतभाष्य में लिख दिया है॥
Footnote
ये ही तीनों अर्थ सायणाचार्य ने भी किये हैं। भर्गः, धीमहि और प्रचोदयात् पदों की सिद्धि में अष्टाध्यायी ६। ४। ४७॥ ६। १। ३४॥ २। ४। ७३ और उणादि ४। १८९। ४॥ २१६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये।
इसमें भी सूक्तसंख्या में मतभेद है। सत्यव्रत सामश्रमी जी कहते हैं कि “विवरण के मत और समस्त मूलसंहिताग्रन्थों के देखने से ज्ञात होता है कि यह तीन ऋचा का सूक्त है। तथा च–इससे अगली “सोमानं स्व०” और “अग्न आयुषि०” ये दो ऋचायें इसी सूक्त की दूसरी और तीसरी ऋचा जाननी चाहियें, न कि अलग अन्य सूक्त। यह विवेक है।” हमने जो ऊपर इसको एकर्चसूक्त लिखा है सो सायणाचार्य का मत है।
ऋग्वेद ३। ६१। १० में भी॥