Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1460

1875 Mantra
Devata- सरस्वान् Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज꣣नी꣢यन्तो꣣ न्व꣡ग्र꣢वः पुत्री꣣य꣡न्तः꣢ सु꣣दा꣡न꣢वः । स꣡र꣢स्वन्तꣳ हवामहे ॥१४६०॥

ज꣣नीय꣡न्तः꣢ । नु । अ꣡ग्र꣢꣯वः । पु꣣त्रीय꣡न्तः꣢ । पु꣣त् । त्रीय꣡न्तः꣢ । सु꣣दा꣢न꣢वः । सु꣣ । दा꣡न꣢꣯वः । स꣡र꣢꣯स्वन्तम् । ह꣣वामहे ॥१४६०॥

Mantra without Swara
जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः । सरस्वन्तꣳ हवामहे ॥

जनीयन्तः । नु । अग्रवः । पुत्रीयन्तः । पुत् । त्रीयन्तः । सुदानवः । सु । दानवः । सरस्वन्तम् । हवामहे ॥१४६०॥

Samveda - Mantra Number : 1460
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(जनीयन्तः) स्त्री चाहते हुए (पुत्रीयन्तः) और पुत्र चाहते हुए (सुदानवः) यज्ञादि परोपकार करने वाले (अग्रवः) उपासक हम (नु) आज हैं॥ (सरस्वन्तम्) सर्वज्ञ परमात्मा को (हवामहे) पुकारते हैं॥
अर्थात् यज्ञादि परोपकार करने वालों को परमात्मा की यज्ञानुष्ठानजनित कृपा से स्त्री पुत्र आदि सब ऐश्वर्य सुख भोग सम्पत्ति प्राप्त होती है॥
सामश्रमी जी कहते हैं कि “विवरण के मत में यह एक ऋचा का सूक्त नहीं है, किन्तु दो ऋचा का प्रगाथ है, तथा च अगली “उत नः” यह ऋचा इसी सूक्त की द्वितीया ऋचा है, न कि अन्य सूक्त। और मूल पुस्तकस्थ पाठों के देखने में सायणमत लेकर से भी यह अनुकूल जान पड़ता है” परन्तु हमने ऊपर व्याख्या इसको एकर्च सूक्त कहा है॥
Footnote
ऋ० ७। ९६। ४ में भी॥