Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 146

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुवु꣣र्गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥१४६॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । अभि꣢ । प्र । नो꣣नुवुः । गि꣡रः꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । व꣣त्स꣢म् । न । धे꣣न꣡वः꣢ ॥१४६॥

Mantra without Swara
इमा उ त्वा पुरूवसोऽभि प्र नोनुवुर्गिरः । गावो वत्सं न धेनवः ॥

इमाः । उ । त्वा । पुरूवसो । पुरु । वसो । अभि । प्र । नोनुवुः । गिरः । गावः । वत्सम् । न । धेनवः ॥१४६॥

Samveda - Mantra Number : 146
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पुरुवसो) बहुयज्ञ ! वा बहुधन ! ईश्वर ! वा राजन् ! (इमाः) ये (गिरः) वाणियें (अभि) चारों ओर से (त्वा उ) तुझ को ही (प्रनोनुवुः) प्राप्त होती हैं। दृष्टान्त — (धेनवः) दूधाली (गावः) गौवें (वत्सं न) जैसे बछड़े को॥
जिसमें गुण अधिक होते हैं सब ओर से उसी की प्रशंसा में वाणी ऐसे पहुँच जाती हैं जैसे दुधाल गायें चारों ओर जंगल में विचरती हुई सायंकाल प्यारे बछड़े ही के पास दौड़ती हैं॥
Footnote
ऋ० ६।४५।२५ में जो पाठ का भेद है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥