Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1459

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣣भङ्गी꣡ शूरो꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ तु꣣वी꣡म꣢घः꣣ स꣡म्मि꣢श्लो वी꣣꣬र्या꣢꣯य꣣ क꣢म् । उ꣣भा꣡ ते꣢ बा꣣हू꣡ वृष꣢꣯णा शतक्रतो꣣ नि꣡ या वज्रं꣢꣯ मिमि꣣क्ष꣡तुः꣢ ॥१४५९॥

प्रभङ्गी꣢ । प्र꣣ । भङ्गी꣢ । शू꣡रः꣢꣯ । म꣣घ꣡वा꣢ । तु꣣वी꣡म꣣घः । तु꣣वि꣢ । म꣣घः । सं꣡मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । वी꣢꣯र्याय । कम् । उ꣣भा꣢ । ते꣣ । बाहू꣡इति꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णा । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । नि꣢ । या । व꣡ज्र꣢꣯म् । मि꣣मिक्ष꣡तुः꣢ ॥१४५९॥

Mantra without Swara
प्रभङ्गी शूरो मघवा तुवीमघः सम्मिश्लो वीर्याय कम् । उभा ते बाहू वृषणा शतक्रतो नि या वज्रं मिमिक्षतुः ॥

प्रभङ्गी । प्र । भङ्गी । शूरः । मघवा । तुवीमघः । तुवि । मघः । संमिश्लः । सम् । मिश्लः । वीर्याय । कम् । उभा । ते । बाहूइति । वृषणा । शतक्रतो । शत । क्रतो । नि । या । वज्रम् । मिमिक्षतुः ॥१४५९॥

Samveda - Mantra Number : 1459
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(शतक्रतो) हे असंख्यकर्मा परमेश्वर ! विविधसृष्टिकर ! (ते) आपकी (उभा) असंख्य होने पर भी बायें दाहिने [अनुकूल प्रतिकूल] भेद से दो प्रकार की (बाहू) भुजायें (वृषणा) कामनाओं को वर्षाने वाली हैं। (या) जो कि (वीर्याय) दुष्ट प्राणियों के निग्रहार्थ (वज्रम्) विविध शक्ति रूप आयुध को (नि — मिमिक्षतुः) धारण कर रही हैं। सो आप (प्रभंगी) प्रलयकाल में सर्वसंहारकारक और (शूरः) अतिविक्रमी (मघवा) परोपकार यज्ञ वाले और (तुवीमघः) अनन्तधन और (संमिश्लः) सब में रमे सर्वव्यापक (कम्) प्रजापति [शतपथ २। ५। २। १३] हैं।
इसमें संस्कृतभाष्योक्त “सर्वेन्द्रियगु०” इत्यादि उपनिषदों और “विश्व तश्चक्षुरुत” इत्यादि वेदमन्त्रों के अनुसंधान से जानना चाहिये कि परमात्मा की अनन्तशक्ति ही रूपकालंकार से वर्णित है, न कि उसका मूर्तिमत्त्व, क्योंकि “न तस्य प्रतिमा अस्ति” यजुः ३२। ३ इत्यादि अन्य श्रुतियों ने उसकी प्रतिमा का निषेध कहा है।
Footnote
ऋग्वेद ८। ६१। १८ में भी॥