Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1448

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ पा꣡त꣢वे꣣ म꣡दा꣢य꣣ प꣡रि꣢ षिच्यसे । म꣣नश्चि꣡न्मन꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ ॥१४४८॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣡म । पा꣡त꣢꣯वे । म꣡दा꣢꣯य । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यसे । मनश्चि꣢त् । म꣣नः । चि꣢त् । म꣡न꣢꣯सः । प꣡तिः꣢꣯ ॥१४४८॥

Mantra without Swara
इन्द्राय सोम पातवे मदाय परि षिच्यसे । मनश्चिन्मनसस्पतिः ॥

इन्द्राय । सोम । पातवे । मदाय । परि । सिच्यसे । मनश्चित् । मनः । चित् । मनसः । पतिः ॥१४४८॥

Samveda - Mantra Number : 1448
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) सोम ! (मनश्चित्) मन का चिनने वाला = निर्माण करने वाला अर्थात् मनस्वीपने का बढ़ाने वाला और (मनसः) मन का (पतिः) पालक [चन्द्रमा की उत्पत्ति समष्टि मनस्तत्व से वेद में कही है, तदनुसार सोम भी चान्द्रमास होने से अपने कार्य का वर्धक पोषक और पालन करने वाला है] (मदाय) हर्ष के लिये (पातवे) पानार्थ (इन्द्राय) राजा के लिये (परिषिच्यसे) सर्वतः पात्रों में सेचन किया जाता है।
Footnote
ऋ० ९। ११। ८ में भी॥