Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1435

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व वृ꣣ष्टि꣢꣫मा सु नो꣣ऽपा꣢मू꣣र्मिं꣢ दि꣣व꣡स्परि꣢꣯ । अ꣣यक्ष्मा꣡ बृ꣢ह꣣ती꣡रिषः꣢꣯ ॥१४३५॥

प꣡व꣢꣯स्व । वृ꣣ष्टि꣢म् । आ । सु । नः꣣ । अपा꣢म् । ऊ꣣र्मि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣यक्ष्माः꣢ । अ꣣ । यक्ष्माः꣢ । बृ꣣हतीः꣢ । इ꣡षः꣢꣯ ॥१४३५॥

Mantra without Swara
पवस्व वृष्टिमा सु नोऽपामूर्मिं दिवस्परि । अयक्ष्मा बृहतीरिषः ॥

पवस्व । वृष्टिम् । आ । सु । नः । अपाम् । ऊर्मिम् । दिवः । परि । अयक्ष्माः । अ । यक्ष्माः । बृहतीः । इषः ॥१४३५॥

Samveda - Mantra Number : 1435
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे कामपूरक ! परमेश्वर ! वा सोम ! (नः) हमारे लिये (अपाम्, ऊर्मिम्, वृष्टिम्) जलों की, लहरी, वर्षा को तथा (अयक्ष्माः, बृहतीः, इषः) नीरोग, बहुत, अन्नों को (दिवः) आकाश से (आ-परि सु-पवस्व) सर्वतः भले प्रकार वर्षाओ॥
वर्षा की बहुतायत और उत्तमता से अन्न भी नीरोग और उत्तम तथा बहुतायत से होते हैं और मानो वर्षा रूप से आकाश से ही अन्न वर्षते हैं।
Footnote
ऋग्वेद ९। ४९। १ में भी॥