Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1432

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अगस्त्यो मैत्रावरुणः Chhand- स्कन्धोग्रीवी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
म꣡त्स्यपा꣢꣯यि ते꣣ म꣢हः꣣ पा꣡त्र꣢स्येव हरिवो मत्स꣣रो꣡ मदः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢ ते꣣ वृ꣢ष्ण꣣ इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ स꣢हस्र꣣सा꣡त꣣मः ॥१४३२॥

म꣡त्सि꣢꣯ । अ꣡पा꣢꣯यि । ते꣣ । म꣡हः꣢꣯ । पा꣡त्र꣢꣯स्य । इ꣣व । हरिवः । मत्सरः꣢ । म꣡दः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । ते꣣ । वृ꣡ष्णे꣢꣯ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । स꣣हस्रसा꣡त꣢मः । स꣣हस्र । सा꣡त꣢꣯मः ॥१४३२॥

Mantra without Swara
मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः । वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाजी सहस्रसातमः ॥

मत्सि । अपायि । ते । महः । पात्रस्य । इव । हरिवः । मत्सरः । मदः । वृषा । ते । वृष्णे । इन्दुः । वाजी । सहस्रसातमः । सहस्र । सातमः ॥१४३२॥

Samveda - Mantra Number : 1432
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(हरिवः) हे सर्वशक्तिमन्निन्द्र परमेश्वर ! (ते) आप (वृष्णः) कामपूरक का पूर्वसूक्तोक्त रीति से उत्पन्न किया (महः) सब ओषधि वनस्पत्यादि में उस-उस रूप से परिणत भारी (मत्सरः) हर्षकारक (मदः) तृप्तिकारक (वाजी) बलवान् बलदायक (सहस्रसातमः) अपरिमित अत्यन्त दाता वा सहस्रों पुरुषों के बांटने को पर्याप्त शक्ति की बहुतायत वाला महानुभाव (इन्दुः) सोम (ते) आपके ही प्रसाद से (पात्रस्येव) मानो पात्र से पी रहे हों ऐसे (अपायि) हमने पिया। (मत्सि) प्राप इस प्रकार हम को हृष्ट और पुष्ट करते हैं, इसलिए पूर्वोक्त प्रकार स्तुत्य हैं।
Footnote
ऋ० १। १७५। १ में भी॥