Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1431

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥

आ꣣मा꣡सु꣢ । प꣣क्व꣢म् । ऐ꣡र꣢꣯यः । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दिवि꣢ । घ꣣र्म꣢म् । न । सा꣡म꣢꣯न् । त꣣पता । सुवृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । गि꣡र्व꣢꣯णसे । गिः । व꣣नसे । बृहत् ॥१४३१॥

Mantra without Swara
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यꣳ रोहयो दिवि । घर्मं न सामं तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत् ॥

आमासु । पक्वम् । ऐरयः । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । घर्मम् । न । सामन् । तपता । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । जुष्टम् । गिर्वणसे । गिः । वनसे । बृहत् ॥१४३१॥

Samveda - Mantra Number : 1431
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर ने (आमासु) कच्ची ओषधियों में (पक्वम्) पके रस को (ऐरयः) प्रेरित किया और (सूर्यम्) सूर्य को (दिवि) द्युलोक में (आ रोहयः) ऐसे चढ़ाया कि (न) जैसे (सामम्) वर्ष भर के (घर्मम्) ताप को (सुवृक्तिभिः) ऋतुरूप विभागों से (तपत) तपे। इसलिए हे ईश्वरभक्तो ! तुम (गिर्वणसे) वाणी से सेवनीय इन्द्र = परमेश्वर के लिए (जुष्टन्) प्रीतिपूर्वक (बृहत) बड़े साम को “गाओ” यह परिशेष है॥
परमेश्वर ने आकाश में सूर्य को ऐसी युक्ति से रखा है कि वह सब ऋतुओं में क्रम और विभागपूर्वक ऐसा तपे कि जिससे सब ओषधि वनस्पति आदि भले प्रकार कच्ची से पकी हो जावें। यह अद्भुत परन्तु ज्ञानपूर्वक महाकार्य है जिससे उस परमात्मा का महत्व सूचित होता है, जिसके लिए हमको उसकी महती स्तुति नामगान द्वारा करनी चाहिए॥
Footnote
ऋ० ८। ८९। ७ में भी॥