Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 143

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣पह्वरे꣡ गि꣢री꣣णा꣡ꣳ स꣢ङ्ग꣣मे꣡ च꣢ न꣣दी꣡ना꣢म् । धि꣣या꣡ विप्रो꣢꣯ अजायत ॥१४३॥

उ꣣पह्वरे꣢ । उ꣣प । ह्वरे꣢ । गि꣣रीणाम् । स꣢ङ्गमे꣢ । स꣣म् । गमे꣢ । च꣣ । न꣡दीना꣢म् । धि꣣या꣢ । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । अजायत ॥१४३॥

Mantra without Swara
उपह्वरे गिरीणाꣳ सङ्गमे च नदीनाम् । धिया विप्रो अजायत ॥

उपह्वरे । उप । ह्वरे । गिरीणाम् । सङ्गमे । सम् । गमे । च । नदीनाम् । धिया । विप्रः । वि । प्रः । अजायत ॥१४३॥

Samveda - Mantra Number : 143
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गिरीणान्) मेघों के (उपह्वरे) प्रान्त में (च) और (नदीनां, संगमे) समुद्र पर [इन्द्र का स्थान है, यह प्रथम प्रश्न का उत्तर है] (धिया) जो बुद्धि से (अजायत) प्रसिद्ध होता है वह (विप्रः) विद्वान् [उस इन्द्र का यजन करता है, यह द्वितीय प्रश्न का उत्तर है]॥
Footnote
इसमें सायणाचार्य ने प्रश्नोत्तर की संगति नहीं लगाई॥ ऋ० ८। ६। २८ में “संगथे” पाठ है॥