Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1424

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेणुर्वैश्वामित्रः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स꣡ भक्ष꣢꣯माणो अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ चा꣡रु꣢ण उ꣣भे꣢꣫ द्यावा꣣ का꣡व्ये꣢ना꣣ वि꣡ श꣢श्रथे । ते꣡जि꣢ष्ठा अ꣣पो꣢ म꣣ꣳह꣢ना꣣ प꣡रि꣢ व्यत꣣ य꣡दी꣢ दे꣣व꣢स्य꣣ श्र꣡व꣢सा꣣ स꣡दो꣢ वि꣣दुः꣢ ॥१४२४॥

सः꣢ । भ꣡क्ष꣢꣯माणः । अ꣣मृ꣡त꣢स्य । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯स्य । चा꣡रु꣢꣯णः । उ꣣भे꣡इति꣢ । द्या꣡वा꣢꣯ । का꣡व्ये꣢꣯न । वि । श꣣श्रथे । ते꣡जि꣢꣯ष्ठा । अ꣣पः꣢ । म꣣ꣳह꣡ना꣢ । प꣡रि꣢꣯ । व्य꣣त । य꣣दि꣢꣯ । दे꣣व꣡स्य꣢ । श्र꣡व꣢꣯सा । स꣡दः꣢꣯ । वि꣣दुः꣢ ॥१४२४॥

Mantra without Swara
स भक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे । तेजिष्ठा अपो मꣳहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः ॥

सः । भक्षमाणः । अमृतस्य । अ । मृतस्य । चारुणः । उभेइति । द्यावा । काव्येन । वि । शश्रथे । तेजिष्ठा । अपः । मꣳहना । परि । व्यत । यदि । देवस्य । श्रवसा । सदः । विदुः ॥१४२४॥

Samveda - Mantra Number : 1424
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अमृतस्य) अमृतरूप (चारुणः) सुन्दर वेद के (काव्येन) सस्वर पाठ के साथ (भक्ष्यमाणः) भोजन कराया जाना हुआ = होम किया जाता हुग्रा (सः) वह सोम (उभे) दोनों (द्यावा) द्युलोक पृथिवीलोक को (विशश्रये) भर देता है और (मंहना) महत्त्व से (तेजिष्ठाः) अत्यन्त प्रकाशमान (अपः) जलों को (परिव्यत) आच्छन्न कर देता है (सदः) यज्ञ में (देवस्य) दिव्य सोम देवता के (श्रवसा) यश से [जो वेद मन्त्रों में वर्णित है] (विदुः) वेदज्ञ जानते हैं।
Footnote
ऋ० ९। ७०। २ में “भिक्ष्यमाणः” पाठ है और सायणाचार्य ने यहां भी इकार को आकार मानकर वही अर्थ रखा है॥