Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 142

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रगाथः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क्वा꣢३꣱स्य꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ युवा꣢꣯ तुवि꣣ग्री꣢वो꣣ अ꣡ना꣢नतः । ब्र꣣ह्मा꣡ कस्तꣳ स꣢꣯पर्यति ॥१४२॥

क्व꣢꣯ । स्यः । वृ꣣षभः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । तु꣣विग्री꣡वः꣢ । तु꣣वि । ग्री꣡वः꣢꣯ । अ꣡ना꣢꣯नतः । अन् । आ꣣नतः । ब्रह्मा꣢ । कः । तम् । स꣣पर्यति ॥१४२॥

Mantra without Swara
क्वा३स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः । ब्रह्मा कस्तꣳ सपर्यति ॥

क्व । स्यः । वृषभः । युवा । तुविग्रीवः । तुवि । ग्रीवः । अनानतः । अन् । आनतः । ब्रह्मा । कः । तम् । सपर्यति ॥१४२॥

Samveda - Mantra Number : 142
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्यः) वह (वृषभः) वर्षाने वाला (युवा) बलवान् (तुविग्रीवः) बहुत ग्रीवाओं वाला (अनानतः) नम्रता रहित [तेजस्वी इन्द्र] (क्व) कहां है ? और (कः) कौनसा (ब्रह्मा) वेदज्ञ (तम्) उसको (सपर्यति) आहुति देता है ?
इस मन्त्र में ये दो प्रश्न हैं कि इन्द्र का स्थान कहां है ? और किस प्रकार का विद्वान् यज्ञ करे ? अगले मन्त्र में दोनों प्रश्नों का उत्तर कहेंगे॥
Footnote
ज्वालाप्रसाद भार्गव जी ने (क्वा३स्य) इस प्लुत को बिना समझे (क्व, अस्य) ऐसा विश्लेष कर डाला और सायण, सत्यव्रत, पदपाठ और मूल के विरुद्ध व्याख्या कर डाली, भला जिन्हें शुद्ध पाठ का भी निश्चय नहीं वे भाष्य करने की इच्छा करते हैं ? निघण्टु ३। १। अष्टाध्यायी ६।१।१३३॥ ८।२। १०० के प्रमाण तथा ऋ० ६।४।२७ में जो पाठ में भेद है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥