Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 14

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वाग्ने दि꣣वे꣡दि꣢वे꣣ दो꣡षा꣢वस्तर्धि꣣या꣢ व꣣य꣢म् । न꣢मो꣣ भ꣡र꣢न्त꣣ ए꣡म꣢सि ॥१४॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । अग्ने । दिवे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे । दो꣡षा꣢꣯वस्तः । दो꣡षा꣢꣯ । व꣣स्तः । धिया꣢ । व꣣य꣢म् । न꣡मः꣢꣯ । भ꣡र꣢꣯न्तः । आ । इ꣣मसि ॥१४॥

Mantra without Swara
उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम् । नमो भरन्त एमसि ॥

उप । त्वा । अग्ने । दिवेदिवे । दिवे । दिवे । दोषावस्तः । दोषा । वस्तः । धिया । वयम् । नमः । भरन्तः । आ । इमसि ॥१४॥

Samveda - Mantra Number : 14
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) मार्गदर्शक ! परमात्मन् ! (वयम्) हम लोग (धिया) मन से (नमः, भरन्तः) नमस्कार, लिये हुए (दिवे दिवे) प्रतिदिन (दोषावस्तः) सायं और प्रातः (त्या) आप की (उप, एमसि) उपासना करें॥
इस मन्त्र से प्रातः सायं नित्य प्रति मनुष्यमात्र को परमात्मा की उपासना मन लगाकर करने की शिक्षा दी गई है। ब्रह्मयज्ञ सन्ध्योपासना के अनुष्ठान का समय बताया गया है। दोषा रात्रि को और वस्त: दिन को कहते हैं सो जिन गृहाश्रमी आदि मनुष्यों से अन्य कार्यों के वश समस्त दिन रात्रि में उपासना नहीं हो सकती, क्योंकि वेद ने उन-उन आश्रमों के अन्य कर्त्तव्य भी बतलाये हैं जिन का करना आवश्यक है और समय चाहता है। इसलिये रात्रि दिन के अर्थ में संकोच विवक्षित समझ कर प्रातः सायं समझना ठीक है।
भौतिक पक्ष में — (अग्ने) प्रत्यक्ष अग्नि ! (वयम्) हम लोग (दिवे दिवे) प्रतिदिन (दोषावस्तः) सायं प्रातः (धिया) मन लगाकर (नमः) चरु वा आहुति के अन्न को (भरन्तः) [स्त्रुवादि में] लिये हुए (त्वा) तेरे (उप) समीप (एमसि) भावें॥
अर्थात् मनुष्य को योग्य है कि प्रातः सायं नित्य विधिपूर्वक मन लगा कर श्रद्धा से होम करने को होम सामग्री लिये हुए अग्निकुण्ड के समीप जावे॥
Footnote
शान्तनसूत्र ५। ११॥ अष्टा० ३। १। ४॥ ६। १। १८६॥ ६। १। १६२॥ ७। १। ४६॥ ८। १। २३॥ निघं० २।७॥ १। ७॥ १। ९॥ महाभाष्य ६। १। १५८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य पृष्ठ ३६ से देखो॥ ऋग्वेद (१। १। ७) में भी ऐसा ही पाठ है॥ ४॥