Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1392

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ र꣡थे꣢ हिर꣣ण्य꣢ये꣣ ह꣡री꣢ म꣣यू꣡र꣢शेप्या । शि꣣तिपृष्ठा꣡ व꣢हतां꣣ म꣢ध्वो꣣ अ꣡न्ध꣢सो वि꣣व꣡क्ष꣢णस्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥१३९२॥

आ꣢ । त्वा꣣ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । म꣣यू꣡र꣢शेप्या । म꣣यू꣡र꣢ । शे꣣प्या । शितिपृष्ठा꣢ । शि꣣ति । पृष्ठा꣢ । व꣣हताम् । म꣡ध्वः꣢꣯ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि꣣व꣡क्ष꣢णस्य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥१३९२॥

Mantra without Swara
आ त्वा रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या । शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये ॥

आ । त्वा । रथे । हिरण्यये । हरीइति । मयूरशेप्या । मयूर । शेप्या । शितिपृष्ठा । शिति । पृष्ठा । वहताम् । मध्वः । अन्धसः । विवक्षणस्य । पीतये ॥१३९२॥

Samveda - Mantra Number : 1392
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र ! सूर्य ! (मयूरशेप्या) मयूर की पूंछ के समान अनेक वर्ण वाले भी (शितिपृष्ठा) एक श्वेतवर्ण की प्रतीति से युक्त (हरी) तिरछे सीधे भेद से दो प्रकार के किरणसमूह, (विवक्षणस्य) प्रशंसनीय (मध्वः) मधुर (अन्धस) अन्न हव्य सोम के (पीतवे) पानार्थ (हिरण्यये) तेजोमय (रथे) रमणीय स्वरूप में (त्वा) तुझको (आवहताम्) सर्वतः ले चलते हैं।
तात्पर्य यह है कि सूर्य की किरणें जो सीधी और तिरछी होकर दो प्रकार हम तक आती हैं और जिनमें मोर की पुच्छ के से सात ७ रंग हैं पर सब मिलकर एक श्वेत पृष्ठ जान पड़ते हैं, वे किरणें “अग्नौ प्रास्ताहुतिः०” इत्यादि मनुवचनोक्तरीत्यनुसार सोमादि मधुर प्रशंसनीय हव्य पदार्थ सूर्य में पहुँचाती हैं।
Footnote
अष्टाध्यायी ७। ३। ३९ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ८। १। २५ में भी॥