Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1390

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣡ की꣢ रे꣣व꣡न्त꣢ꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ विन्दसे꣣ पी꣡य꣢न्ति ते सुरा꣣꣬श्वः꣢꣯ । य꣣दा꣢ कृ꣣णो꣡षि꣢ नद꣣नु꣡ꣳ समू꣢꣯ह꣣स्या꣢꣫दित्पि꣣ते꣡व꣢ हूयसे ॥१३९०॥

न꣢ । किः꣣ । रेव꣡न्त꣢म् । स꣣ख्या꣡य꣢ । स꣣ । ख्या꣡य꣢꣯ । वि꣣न्दसे । पी꣡य꣢꣯न्ति । ते꣣ । सुराश्वः꣢ । य꣣दा꣢ । कृ꣣णो꣡षि꣢ । न꣣दनु꣢म् । सम् । ऊह꣣सि । आ꣢त् । इत् । पि꣣ता꣢ । इ꣣व । हूयसे ॥१३९०॥

Mantra without Swara
न की रेवन्तꣳ सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः । यदा कृणोषि नदनुꣳ समूहस्यादित्पितेव हूयसे ॥

न । किः । रेवन्तम् । सख्याय । स । ख्याय । विन्दसे । पीयन्ति । ते । सुराश्वः । यदा । कृणोषि । नदनुम् । सम् । ऊहसि । आत् । इत् । पिता । इव । हूयसे ॥१३९०॥

Samveda - Mantra Number : 1390
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र ! हे राजन् ! (रेवन्तम्) केवल धनी जो यज्ञादि परोपकार में धन नहीं लगाता उस धनी मानी को आप (सख्याय) मित्रता के लिये (नकि:) नहीं (विन्दसे) रखते क्योंकि (सुराश्वः) मद्यादि व्यसनों से बढ़े हुए प्रमत्त नास्तिक वे धनी मानी लोग (ते) आपकी (पीयन्ति) हिंसा करते हैं। किन्तु — (नदनुम्) स्तुति करने वाले राजभक्त प्रजाजन को (यदा) जब आप (आकृणोषि) बुलाते हैं तब (समूहसि) उसका धनादि से सत्कार करते हैं (आत् इत्) तब (पितेव) पिता के समान (हूयसे) उससे स्तुत होते हैं।
Footnote
ऋ० ८। २१। १४ में भी॥