Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 139

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सो꣣मा꣢ना꣣ꣳ स्व꣡र꣢णं कृणु꣣हि꣡ ब्र꣢ह्मणस्पते । क꣣क्षी꣡व꣢न्तं꣣ य꣡ औ꣢शि꣣जः꣢ ॥१३९॥

सो꣣मा꣡ना꣢म् । स्व꣡र꣢꣯णम् । कृ꣣णुहि꣢ । ब्र꣣ह्मणः । पते । कक्षी꣡व꣢न्तम् । यः । औ꣣शिजः꣢ ॥१३९॥

Mantra without Swara
सोमानाꣳ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥

सोमानाम् । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते । कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः ॥१३९॥

Samveda - Mantra Number : 139
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्मणस्पते) परमेश्वर ! (यः) जो मैं (औशिजः) मेधावी विद्वान् का पुत्र हूँ [उस मुझ को] (सोमानाम्) सब प्रकार की सोमौषधियों का (स्वरणम्) सुन्दर बनाने वाला (कक्षीवन्तम्) शिल्पी के समान (कृणुहि) कीजिये॥
अर्थात् हे परमात्मन् ! पूर्वमन्त्रोक्त इन्द्र के अनुकूल होने और वृष्टि आदि सुख के लिये कृपया जो हम लोगों में विद्वान् लोगों के शिष्य पुत्र हैं उनको शिल्पियों के समान सोमों का सुन्दर रीति से बनाने वाला कीजिये॥
Footnote
कक्षीवन्तं के आगे ‘इव’ और ‘माम्’ ये पद निरुक्तकार के मत में अध्याहृत समझने चाहियें जैसा कि यास्क मुनि कहते हैं कि “सोम का सम्पादक प्रकाशन वाला करो हे परमेश्वर ! जैसा कि शिल्पी को। जो मेधावी की सन्तान हूं। कक्षीवान् कक्ष्यवान् को और औशिज उशिज् के पुत्र को समझो, उशिज् कान्तिकर्मा से बना है और कक्ष से मनुष्यकक्ष अभिप्राय है। उस मुझको हे ब्रह्मणस्पते ! सोम का सम्पादक प्रकाश वाला कीजिये॥” ऋग्वेद १।१८।१ में ‘सोमानम्’ पाठ है इसलिये निरुक्त में उसी की व्याख्या है, सोमानाम् की नहीं। कक्षीवन्तम् पद की सिद्धि में व्याकरणानुसार सामान्य संज्ञा समझनी चाहिये, न कि किसी विशेष की। सायणाचार्य ने इसमें कक्षीवान् और औशिज का इतिहासपरक अर्थ किया है और तैत्तिरीय का पाठ उद्धृत किया है परन्तु उस पाठ में ऋषियों के कक्षीवान् आदि नामों के आने यह किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं होता कि इस वेदमन्त्र में भी कक्षीवान् वही ऋषि समझा जावे। और निरुक्तकार की व्याख्या से भी ऐसा ही अर्थ निकालना आवश्यक नहीं है। क्योंकि सामान्यवाचक कक्षीवान् से शिल्पिमात्र और उशिज् से सब किसी मेधावी सामान्य का अर्थ लिया जा सकता है। ज्वालाप्रसाद जी भार्गव ने तो व्याकरण और निरुक्त दोनों से विरुद्ध अर्थ किया है। यथा—“कक्षं पापम्” इत्यादि और “सोमानम् अम्” इत्यादि॥
निघण्टु ३। १४॥ २। ५॥ ३। १५। निरुक्त ६।१०॥ अष्टाध्यायी ४। ४।११०॥ ५।२। ९४॥ ६।१।३७॥ ८।२।१२॥ ८।३।५३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥५॥