Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1388

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स꣢ वी꣣रो꣡ द꣢क्ष꣣सा꣡ध꣢नो꣣ वि꣢꣫ यस्त꣣स्त꣢म्भ꣣ रो꣡द꣢सी । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अव्यत वे꣣धा꣡ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८८॥

सः । वी꣣रः꣢ । द꣣क्षसा꣡ध꣢नः । द꣣क्ष । सा꣡ध꣢꣯नः । वि । यः । त꣣स्त꣡म्भ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣व्यत । वेधाः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१३८८॥

Mantra without Swara
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी । हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम् ॥

सः । वीरः । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः । वि । यः । तस्तम्भ । रोदसीइति । हरिः । पवित्रे । अव्यत । वेधाः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१३८८॥

Samveda - Mantra Number : 1388
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (हरिः) हरा सोम (पवित्रे) दशापवित्र पर (अव्यत) सम्बद्ध होता है (सः) वही रूपान्तर से (दक्षसाधनः) बल का साधन होकर (वीरः) बली सोम (रोदसी) द्युलोक पृथिवीलोक को (वितस्तम्भ) थाम्भ रहा है (न) जैसे (वेधाः) विधाता (योनिम्) स्थान = ब्रह्माण्ड में (आसदम्) आसीन है॥
स्वभावसिद्ध बात है कि गरमी प्रत्येक वस्तु को विशीर्ण करती बखेरती और सोम शीतल होने से सब पदार्थों को जोड़ता है क्योंकि यह बल का साधन है। बस सोम ने ही रूपान्तर से उस-उस पदार्थ में बलसाधनता से स्थित होकर उस-उस पदार्थ को थांभ रखा है। यह भाव है।
Footnote
ऋ० ९। १०१। १५ में भी॥