Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1382

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ ब्रु꣢वन्तु ज꣣न्त꣢व꣣ उ꣢द꣣ग्नि꣡र्वृ꣢त्र꣣हा꣡ज꣢नि । ध꣣नञ्जयो꣡ रणे꣢꣯रणे ॥१३८२॥

उ꣣त꣢ । ब्रु꣣वन्तु । जन्त꣡वः꣢ । उत् । अ꣣ग्निः꣢ । वृ꣣त्र꣢हा । वृ꣣त्र । हा꣢ । अ꣣जनि । धनञ्जयः꣢ । ध꣣नम् । जयः꣢ । र꣡णे꣢꣯रणे । र꣡णे꣢꣯ । र꣢णे ॥१३८२॥

Mantra without Swara
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि । धनञ्जयो रणेरणे ॥

उत । ब्रुवन्तु । जन्तवः । उत् । अग्निः । वृत्रहा । वृत्र । हा । अजनि । धनञ्जयः । धनम् । जयः । रणेरणे । रणे । रणे ॥१३८२॥

Samveda - Mantra Number : 1382
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहा) पापहन्ता वा शत्रुहन्ता (अग्निः) अग्नि (उत्अजनि) उत्पन्न हुआ है, जो (रणे रणे) प्रत्येक संग्राम में (धनंजयः) विजयप्रद है (उत) तर्कपूर्वक (जन्तवः) आग्नेय विद्या के ज्ञाता प्राणी (ब्रुवन्तु) उपदेश्य उपदेशक भाव से प्रचार करें॥
जो संग्राम देश विजयार्थ चक्रवर्ती राज्यस्थापनार्थ प्रजारक्षार्थ किये जावे उनमें भी अग्निसिद्ध शस्त्रास्त्र ही विजयप्रद हैं, और जो संग्राम वायु आदि गत सूक्ष्म दुष्ट जन्तुओं से मनुष्यादि के शरीरस्थ धातु आदि में स्वास्थ्य के लिये होता है, उसमें भी आग्नेय द्रव्य जो होमादि द्वारा उत्पन्न होकर शरीरों और वायु आदि में फैलते हैं, उन्हीं के द्वारा विजय होता है इसलिये परमात्मा का उपदेश है कि लोग तर्क-वितर्कपूर्वक उपदेश्य उपदेशक वा शिष्य अध्यापक होकर इस विद्या में नया-नया आविष्कार करें॥
Footnote
ऋ० १। ७४। ३ में भी॥