Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1380

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यः꣡ स्नीहि꣢꣯तीषु पू꣣र्व्यः꣡ सं꣢जग्मा꣣ना꣡सु꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । अ꣡र꣢क्षद्दा꣣शु꣢षे꣣ ग꣡य꣢म् ॥१३८०॥

यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥

Mantra without Swara
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु । अरक्षद्दाशुषे गयम् ॥

यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥

Samveda - Mantra Number : 1380
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (पूर्व्यः) सनातन परमेश्वर वा अग्नि (स्नीहितीषु, संजग्मानासु, कृष्टिषु) मरती, जाती प्रजाओं में (दाशुषे) दानशील यज्ञ करने वाले मनुष्य के लिये (गयम्) प्राण को (अक्षरत्) सींचता है। [उस अग्नि के लिये मन्त्रोच्चारण करें] यह पूर्व मन्त्र से अन्वय है।
भाव यह है कि यद्यपि सारी प्रजा मरती जाती दुनिया है, कोई अमर नहीं, परन्तु परमात्मा कें उपासकों और अग्निहोत्रियों को प्राण अधिक मिलता है और वे दीर्घजीवी होते हैं।
Footnote
निघण्टु २। १९ अष्टाध्यायी १। ३। २९ और ३। २। १०६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० १। ७४। २ में भी॥