Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1379

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣पप्रय꣡न्तो꣢ अध्व꣣रं꣡ मन्त्रं꣢꣯ वोचेमा꣣ग्न꣡ये꣢ । आ꣣रे꣢ अ꣣स्मे꣡ च꣢ शृण्व꣣ते꣢ ॥१३७९॥

उ꣣पप्रय꣡न्तः꣢ । उ꣣प । प्रय꣡न्तः꣢ । अ꣣ध्वर꣢म् । म꣡न्त्र꣢꣯म् । वो꣣चेम । अग्न꣡ये꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣢स्मे꣡इति꣢ । च꣣ । शृण्वते꣢ ॥१३७९॥

Mantra without Swara
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये । आरे अस्मे च शृण्वते ॥

उपप्रयन्तः । उप । प्रयन्तः । अध्वरम् । मन्त्रम् । वोचेम । अग्नये । आरे । अस्मेइति । च । शृण्वते ॥१३७९॥

Samveda - Mantra Number : 1379
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अध्वरं) जो हिंसा से रहित है उस यज्ञ के (उपप्रयन्तः) समीप उत्तम प्रकार से जाते हुए और यज्ञ में पहुँच कर यज्ञारम्भ करते हुए हम (आरे) दूर (च) और (अस्मे) हमारे समीपवत्तियों की (शृण्वते) सुनाई करते हुए (अग्नये) ज्ञानस्वरूप परमात्मा के लिये (मन्त्रम्) स्तोत्र को (वोचेम) उच्चारित करें।
जो परमात्मा दूरस्थों और अस्मदादि के समीपस्थों की सबकी सुनाई करता है उस ज्ञानस्वरूप परमात्मा के लिये उसकी स्तुतिरूप वेदसूक्तों स्तोत्रों का पाठ यज्ञ के आरम्भ में अवश्य करना चाहिये॥
अथवा भौतिक पक्ष में:— (आरे) दूरस्थों (च) और (अस्मे) हमारे समीपर्वात्तयों की—सबकी (शृण्वते) स्वीकार करने वाले (अग्नये) अग्नि के लिये (मन्त्रम्) आग्नेयसूक्तादि वेदमन्त्र का (अध्वरम् उपप्रयन्तः) यज्ञ में जाते हुए हम (वोचेम) उच्चारण करें॥
भौतिक अग्नि भी दूरस्थ और समीपस्थ सब प्राणियों का उपकार कर सकता है जब कि होमा जावे, और अग्नि में होमजनित लाभ वर्णन करने वाले मन्त्रों में कहे फल को पूरा कर देना ही, सुनाई करना समझिये, सो उन अग्निविषयक मन्त्रों द्वारा यज्ञारम्भ में याज्ञिकों को पाठ करना चाहिये॥ १॥
Footnote
ऋ० १। ७४। १ तथा यजुः ३। ११ में भी॥