Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 137

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१३७॥

स꣢म् । अ꣣स्य । मन्य꣡वे꣢ । वि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । न꣣मन्त । कृष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्राय । स꣣म् । उद्रा꣡य꣢ । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । ॥१३७॥

Mantra without Swara
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥

सम् । अस्य । मन्यवे । विशः । विश्वाः । नमन्त । कृष्टयः । समुद्राय । सम् । उद्राय । इव । सिन्धवः । ॥१३७॥

Samveda - Mantra Number : 137
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विश्वाः) सब (कृष्टयः मनुष्यरूप (विशः) प्रजाएं (अस्य) इस [इन्द्र वा राजा वा परमेश्वर] के (मन्यवे) तेज के लिये (सम्, नमन्त) भले प्रकार झुकते हैं (समुद्रायेव, सिन्धवः) जैसे समुद्र के लिये, नदियां॥
अर्थात् बिजुली वा राजा वा परमेश्वर का तेज सब तेजों का दबाने वाला सर्वोपरि है, इसलिये सब उसके सामने नम्र हो जाते हैं। मन्यु शब्द का अर्थ क्रोध है और क्रोध भी तेज की पराकाष्ठा है इसलिये यहाँ प्रकरण में मन्यु पद से तेज का ग्रहण करना चाहिये॥
Footnote
ऋ० ८।६।४ में भी॥