Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1368

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣡मृता꣢꣯य म꣣हे꣡ क्षया꣢꣯य꣣ स꣢ शु꣣क्रो꣡ अ꣢र्ष दि꣣व्यः꣢ पी꣣यू꣡षः꣢ ॥१३६८॥

ए꣣व꣢ । अ꣣मृ꣡ता꣢य । अ꣣ । मृ꣡ता꣢꣯य । म꣣हे꣢ । क्ष꣡या꣢꣯य । सः । शु꣣क्रः꣢ । अ꣣र्ष । दिव्यः꣢ । पी꣣यू꣡षः꣢ ॥१३६८॥

Mantra without Swara
एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः ॥

एव । अमृताय । अ । मृताय । महे । क्षयाय । सः । शुक्रः । अर्ष । दिव्यः । पीयूषः ॥१३६८॥

Samveda - Mantra Number : 1368
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अमृताय) मेघजल के लिये (महे) और बड़े उत्तम (क्षयाय) निवास के लिये (सः) वह (दिव्यः) दिव्य (पीयूषः) पानयोग्य (शुक्रः) वीर्यदायक सोम (एव) निश्चय (अर्ष) आकाश को जाता है॥
अर्थात् आहुति दिया हुआ सोम प्रकाश को गया हुआ वृष्टिकारक, सुन्दर निवास का हेतु और वीर्यदायक होता है।
Footnote
ऋ० ९। १०९। ३ में भी॥