Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 136

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡ उ꣢ त्वा꣣ वि꣡ च꣢क्षते꣣ स꣡खा꣢य इन्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । पु꣣ष्टा꣡व꣢न्तो꣣ य꣡था꣢ प꣣शु꣢म् ॥१३६॥

इ꣣मे꣢ । उ꣣ । त्वा । वि꣢ । च꣣क्षते । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । इन्द्र । सो꣡मिनः꣢ । पु꣣ष्टा꣡व꣢न्तः । य꣡था꣢꣯ । प꣣शु꣢म् ॥१३६॥

Mantra without Swara
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः । पुष्टावन्तो यथा पशुम् ॥

इमे । उ । त्वा । वि । चक्षते । सखायः । स । खायः । इन्द्र । सोमिनः । पुष्टावन्तः । यथा । पशुम् ॥१३६॥

Samveda - Mantra Number : 136
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) देवविशेष ! (इमे) ये पूर्व मन्त्र में कहे वायु (सोमिनः) सोम लिये हुए (सखायः) तेरे मित्र (उ) भी (त्वा) तुझे (विचक्षते) देखते हैं अर्थात् तेरा उपस्थान करते हैं। दृष्टान्त — (यथा) जैसे (पुष्टावन्तः) पोषरण वाले (पशुम) पशु को॥
तात्पर्य यह है कि वायु इन्द्र के मित्र हैं, वे सोम की लताओं में से शोष कर तथा हवन किए हुए सोमों को लेकर इन्द्र को ऐसें उपस्थित होते हैं, जैसे पशु के पोषण करने वाले घास आदि उत्तम चारा लेकर गवादि पशुओं की उपस्थित होते हैं। पशु की उपमा अपमान के योग्य नहीं है, पशु भी इन्द्र के समान जगत् के उपकारक हैं॥
Footnote
निघण्टु ३।११ आदि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ८।४५।१६ में भी॥