Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1357

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ꣡ जागृ꣢꣯वि꣣र्वि꣡प्र꣢ ऋ꣣तं꣢ म꣢ती꣣ना꣡ꣳ सोमः꣢꣯ पुना꣣नो꣡ अ꣢सदच्च꣣मू꣡षु꣢ । स꣡प꣢न्ति꣣ यं꣡ मि꣢थु꣣ना꣢सो꣣ नि꣡का꣢मा अध्व꣣र्य꣡वो꣢ रथि꣣रा꣡सः꣢ सु꣣ह꣡स्ताः꣢ ॥१३५७॥

आ꣢ । जा꣡गृ꣢꣯विः । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । ऋत꣢म् । म꣣तीना꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣सदत् । चमू꣡षु꣢ । स꣡प꣢꣯न्ति । यम् । मि꣣थुना꣡सः꣢ । नि꣡का꣢꣯माः । नि । का꣣माः । अध्वर्य꣡वः꣢ । र꣣थिरा꣡सः꣢ । सु꣣ह꣡स्ताः꣢ । सु꣣ । ह꣡स्ताः꣢꣯ ॥१३५७॥

Mantra without Swara
आ जागृविर्विप्र ऋतं मतीनाꣳ सोमः पुनानो असदच्चमूषु । सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः ॥

आ । जागृविः । विप्रः । वि । प्रः । ऋतम् । मतीनाम् । सोमः । पुनानः । असदत् । चमूषु । सपन्ति । यम् । मिथुनासः । निकामाः । नि । कामाः । अध्वर्यवः । रथिरासः । सुहस्ताः । सु । हस्ताः ॥१३५७॥

Samveda - Mantra Number : 1357
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सत्यम्) सच्चे (मतीनाम्) मेधा तत्त्वों का (विप्रः) मेधावी (सोमः) सोम (जागृविः) निद्रा तन्द्रा आलस्यादि का निवारक चेतन करने वाला होने से जागरणशील (पुनानः) शोध्यमान (चमूषु) यज्ञ पात्र चमसों से (आऽसदत्) सब ओर रक्खा जाकर रहता है, (यम्) जिस सोम को (मिथुनासः) सपत्नीक (निकामाः) नितरां कामना करने वाले (रथिरासः) यज्ञ ले चलने वाले नेता (सुहस्ताः) शोभन हाथों वाले (अध्वर्यवः) अध्वर्यु लोग (सपन्ति) सत्कृत करते = सुधारते हैं।
Footnote
निघण्टु ३। १२ और ३। १४ में सपति क्रिया को परिचरणकर्मा और अर्चतिकर्माओं में गिनाया है और निरुक्त ३। १३ और ३। १९ में इसका व्याख्यान, है, वहां भी इसका स्पर्श अर्थ नहीं किया। इस से निरुक्त प्रमाण का नाम लेकर सायणाचार्य ने जो स्पर्श अर्थ किया है, वह भ्रममूलक ही जान पड़ता है॥
ऋ० ९। ९७। ३७ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥