Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1352

1875 Mantra
Devata- आदित्यः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु꣣प्रावी꣡र꣢स्तु꣣ स꣢꣫ क्षयः꣣ प्र꣡ नु याम꣢꣯न्त्सुदानवः । ये꣡ नो꣢ अ꣡ꣳहो꣢ऽति꣣पि꣡प्र꣢ति ॥१३५२॥

सु꣣प्रावीः꣢ । सु꣣ । प्रावीः꣢ । अ꣣स्तु । सः꣢ । क्ष꣡यः꣢꣯ । प्र । नु । या꣡म꣢꣯न् । सु꣣दानवः । सु । दानवः । ये꣢ । नः꣣ । अ꣡ꣳहः꣢꣯ । अ꣣तिपि꣡प्र꣢ति । अ꣣ति । पि꣡प्र꣢꣯ति ॥१३५२॥

Mantra without Swara
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः । ये नो अꣳहोऽतिपिप्रति ॥

सुप्रावीः । सु । प्रावीः । अस्तु । सः । क्षयः । प्र । नु । यामन् । सुदानवः । सु । दानवः । ये । नः । अꣳहः । अतिपिप्रति । अति । पिप्रति ॥१३५२॥

Samveda - Mantra Number : 1352
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ये) जो पूर्व मन्त्र में मित्रादि वायुभेद गिनाये हुए देव (नः) हम को (अंहः) आलस्यादि पाप से (अतिपिप्रति) पार करते हैं उनके साथ (सः) वह (क्षयः) रहना = निवास (यामन्) उस प्रहर में (तु) [विर्तक में] (प्र) अत्यन्त (सुप्रावीः) सुरक्षक (अस्तु) होवे।
प्रातःकाल उठने और मित्रादि वायुभेद के सेवन करने वाले निरालस्य हम लोगों को वह उस प्रकार रहन-सहन शुभ हो, यह तात्पर्य है॥
Footnote
ऋ० ७। ६६। ५ में भी॥