Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1351

1875 Mantra
Devata- आदित्यः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢द꣣द्य꣢꣫ सू꣣र उ꣢दि꣣ते꣡ऽना꣢गा मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । सु꣣वा꣡ति꣢ सवि꣣ता꣡ भगः꣢꣯ ॥१३५१॥

य꣢त् । अ꣣द्य । अ꣢ । द्य꣣ । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । अ꣡ना꣢꣯गाः । अन् । आ꣣गाः । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣡र्यमा꣢ । सु꣣वा꣡ति꣢ । स꣣विता꣢ । भ꣡गः꣢꣯ ॥१३५१॥

Mantra without Swara
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा । सुवाति सविता भगः ॥

यत् । अद्य । अ । द्य । सूरे । उदिते । उत् । इते । अनागाः । अन् । आगाः । मित्रः । मि । त्रः । अर्यमा । सुवाति । सविता । भगः ॥१३५१॥

Samveda - Mantra Number : 1351
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जो कुछ (सूरे) सूर्य (उदिते) उदय होने पर = प्रातः काल (अनागाः) निर्दोष (मित्रः, अर्यमा, सविता, भगः) मित्र, अर्यमा, सविता, भग नामक आकाशस्थ वायुभेद देवविशेष (सुवाति) उत्पन्न करे, वह (अद्य) आज हमें प्राप्त हो।
मनुष्यों को चाहिये कि प्रातःकाल सवेरे उठकर परेश की उपासनादि करें और प्रार्थना करें कि प्राणादि वायु जो सर्वसम्पत्तियों के कर्ता हैं और जो सूर्योदय के कुछ पूर्व से ही निर्दोष रहते हैं और जगत् का उपकार करते हैं, हमारा भी उपकार करें। इसलिये यह भी ध्वनित हुआ कि मनुष्य को बहुत सवेरे के निर्दोष प्राणादि वायुओं का सेवन करना चाहिये जिससे सम्पत्ति बढ़ती हैं।
Footnote
ऋ०७।६६।४ में भी॥