Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 135

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥

इ꣣ह꣢ । इ꣣व । शृण्वे । एषाम् । क꣡शाः꣢꣯ । ह꣡स्ते꣢꣯षु । यत् । व꣡दा꣢꣯न् । नि । या꣡म꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ऋ꣣ञ्जते ॥१३५॥

Mantra without Swara
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामं चित्रमृञ्जते ॥

इह । इव । शृण्वे । एषाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । वदान् । नि । यामन् । चित्रम् । ऋञ्जते ॥१३५॥

Samveda - Mantra Number : 135
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब कि हम दोनों (वदान्) बात करते हैं तब (इहेव) समीप ही के समान (शृण्वः) सुनते हैं [इससे जाना जाता है कि] (एषाम्) इनके (हस्तेषु) हाथों में (कशाः) वाणी हैं (चित्रम्) आश्चर्यकारक (यामम) मार्ग को (नि-ऋजते) नितरां सुधारता है॥
जब हम दो आपस में वार्तालाप करते हैं तो अपने से भिन्न देशवर्ती दूसरे का शब्द हमको ऐसे सुनाई देता है जैसे कोई कान से कान लगाकर कहे। इस से जाना जाता है कि इस बोलने और सुनने के आश्चर्यजनक मार्ग की डोर वायु के हाथों में है अर्थात् वायु के अधीन बोलना, सुनना है। इन इन्द्र के सहचारी वायुओं में मैक्समूलर साहिब ने जो इस ऋचा में बलिदानादि की चर्चा की है, वह निर्मूल प्रतीत होती है क्योंकि मूलमन्त्र में इस अर्थ का वाचक कोई पद नहीं दीखता॥
Footnote
निरुक्त ६।२१ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १। ३७। ३ में ‘यामन्’ ऐसा पाठ है॥