Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1349

1875 Mantra
Devata- नराशंसः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢रा꣣श꣡ꣳस꣢मि꣣ह꣢ प्रि꣣य꣢म꣣स्मि꣢न्य꣣ज्ञ꣡ उप꣢꣯ ह्वये । म꣡धु꣢जिह्वꣳ हवि꣣ष्कृ꣡त꣢म् ॥१३४९॥

नरा꣣श꣡ꣳस꣢म् । इ꣣ह꣢ । प्रि꣣य꣢म् । अ꣣स्मि꣢न् । य꣣ज्ञे꣢ । उ꣡प꣢꣯ । ह्व꣢ये । म꣡धु꣢꣯जिह्वम् । म꣡धु꣢꣯ । जि꣣ह्वम् । हविष्कृ꣡त꣢म् । ह꣣विः । कृ꣡त꣢꣯म् ॥१३४९॥

Mantra without Swara
नराशꣳसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उप ह्वये । मधुजिह्वꣳ हविष्कृतम् ॥

नराशꣳसम् । इह । प्रियम् । अस्मिन् । यज्ञे । उप । ह्वये । मधुजिह्वम् । मधु । जिह्वम् । हविष्कृतम् । हविः । कृतम् ॥१३४९॥

Samveda - Mantra Number : 1349
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
मैं यज्ञकर्त्ता (अस्मिन्) इस (यज्ञे) यज्ञ में (इह) इस वेदी के बीच में (प्रियम्) हितकारक (हविष्कृतम्) द्रव्यों को हव्य बनाने वाले (मधुजिह्वम) इसी से माधुर्यरस का स्वाद लेने वाली जिह्वा वाले (नराशंसम्) अग्नि की (उपह्वये) स्तुति = प्रशंसा करता हूँ।
Footnote
“नराशंस यज्ञ का नाम है क्योंकि नर = मनुष्य इस (यज्ञ) में बैठे हुए स्तुति पढ़ते हैं, यह कात्थकियों का मत है और शाकपूणि आचार्य (कहते हैं कि) अग्नि का नाम नराशंस है क्योंकि नरों = ऋत्विगादि से प्रशंसनीय है”॥
निरुक्त ८। २ का मूल संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० १। १३। ३ में भी॥