Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1348

1875 Mantra
Devata- तनूनपात् Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣡धु꣢मन्तं तनूनपाद्य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ नः कवे । अ꣣द्या꣡ कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१३४८॥

म꣡धु꣢꣯मन्तम् । त꣣नूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञ꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ । नः꣣ । कवे । अ꣡द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । कृ꣣णुहि । ऊत꣡ये꣢ ॥१३४८॥

Mantra without Swara
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुह्यूतये ॥

मधुमन्तम् । तनूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञम् । देवेषु । नः । कवे । अद्य । अ । द्य । कृणुहि । ऊतये ॥१३४८॥

Samveda - Mantra Number : 1348
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(कवे) अग्नि के प्रकाश से ज्ञान बढ़ने के कारण हे मेधाविन् ! (तनूनपात्) जलों से उत्पन्न होने वाला तू (अद्य) आज (नः) हमारे (मधुमन्तम्) माधुर्ययुक्त (यज्ञम्) हव्य को (ऊतये) रक्षा के लिये (देवेषु) वायु आदि देवों के समीप (कृणुहि) कर = पहुँचा दे। अग्नि का नाम ‘तनूनपात्’ = जलों से उत्पन्न हुआ होने में नीचे लिखा निरुक्त का भाषार्थ प्रमाण है। निरुक्त का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
तनूनपात्, घृत है, “नपात्” यह अनन्तर सन्तान का नाम है, जो कि निर्णततमा होती है, इस अर्थ में तनू नाम गौ का है क्योंकि इसमें भोग विस्तृत है, गौ से दुग्ध और दुग्ध से घृत होता है॥ शाकपूरिण आचार्य का मत है कि तनूनपात् अग्नि का नाम है, इस अर्थ में तनू शब्द जलवाचक है क्योंकि जल प्रकाश में तने (फैले) रहते हैं, उनसे ओषधि वनस्पति उत्पन्न होती हैं, ओषधि वनस्पतियों से यह (अग्नि) उत्पन्न होता है।
Footnote
ऋ० १। १३। २ में भी॥