Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 134

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भि꣣न्धि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣢षः꣣ प꣢रि꣣ बा꣡धो꣢ ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१३४॥

भि꣣न्धि꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । प꣡रि꣢ । बा꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१३४॥

Mantra without Swara
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

भिन्धि । विश्वाः । अप । द्विषः । परि । बाधः । जहि । मृधः । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१३४॥

Samveda - Mantra Number : 134
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
[प्रकरणगत इन्द्र ! परमात्मन् ! राजन् ! वा देवविशेष !] (विश्वाः) सब (द्विष) द्वेषकर्त्री और (बाघः) वाघती हुइयों को (अप, भिन्धि) छिन्न-भिन्न करो (मृधः) संग्रामों को (परि, गहि) सब ओर से, मारिये (तत्) उनका वह (स्वार्हम्) कामनायोग्य (वसु) धन (आभर) प्राप्त कराइये॥
राजा का धर्म है कि सज्जनों की रक्षा के लिये दुष्टों की सेनाओं का छेदन-भेदन, शत्रुओं का नाश और धन को लेकर न्याय कार्य में व्यय करे॥ इन्द्र = दृष्टिकर्त्ता का काम है कि घुमण्ड-घुमण्ड कर सामने आते मेघों की सेनाओं का छेदनभेदन करके प्रजा के चाहे हुए उनके जल रूप धन को प्रजा को पहुँचाना॥ सर्व दुष्टों अधार्मिकों के दमन और श्रेष्ठों की रक्षार्थं परमेश्वर से भी प्रार्थना करनी चाहिये॥
Footnote
ऋ० ८।४५।४० में भी॥