Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 133

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ घा꣣ ये꣢ अ꣣ग्नि꣢मि꣣न्ध꣡ते꣢ स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ ब꣣र्हि꣡रा꣢नु꣣ष꣢क् । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३॥

आ꣢ । घा꣣ । ये꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । इ꣣न्ध꣡ते꣢ । स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ । ब꣣र्हिः꣢ । अ꣣नुष꣢क् । अ꣣नु । स꣢क् । ये꣡षा꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यु꣡वा꣢꣯ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । ॥१३३॥

Mantra without Swara
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक् । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥

आ । घा । ये । अग्निम् । इन्धते । स्तृणन्ति । बर्हिः । अनुषक् । अनु । सक् । येषाम् । इन्द्रः । युवा । सखा । स । खा । ॥१३३॥

Samveda - Mantra Number : 133
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ये) जो लोग (आा, घ) अभिमुखता से (अग्निम्, इन्धते) अग्नि को, प्रदीप्त करते हैं (येषाम्) जिनका (इन्द्रः) दृष्टिकर्त्ता (युवा) बलवान् (सखा) अनुकूल है वे (आनुषक्) क्रमपूर्वक (बर्हिः) कुशादि के आसन (स्तृणन्ति) बिछाते हैं।
जो लोग याज्ञिक हैं वे बीच में अग्नि सिलगाकर चारों ओर आसन बिछाय इन्द्रयाग करते हैं जिससे बलवान् दृष्टिकर्त्ता उसके अनुकूल होकर वर्षा करता है। पं० ज्वालाप्रसाद जी ने (आ, घ) इन दो अव्ययों को एक करके (आघाः) निष्पापाः, यह हसी-योग्य व्याख्या की है।
Footnote
निरुक्त ६। १४ में लिखा है कि “आनुषक, यह क्रमपूर्वक का नाम है” जैसा कि “स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्, यह वेदवाक्य है” देखिये ठीक ऐसे ही मन्त्र के ऋग्वेदस्थ (८। ४५।१) पाठ का निरुक्तकार ने उदाहरण दिया है॥