Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 132

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣य꣡मि꣢न्द्र त्वा꣣य꣢वो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो वृषन् । वि꣣द्धी꣢ त्वा३꣱स्य꣡ नो꣢ वसो ॥१३२॥

व꣣य꣢म् । इ꣣न्द्र । त्वाय꣡वः꣢ । अ꣣भि꣢ । प्र । नो꣣नुमः । वृषन् । विद्धि꣢ । तु । अ꣣स्य꣢ । नः꣣ । वसो ॥१३२॥

Mantra without Swara
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र नोनुमो वृषन् । विद्धी त्वा३स्य नो वसो ॥

वयम् । इन्द्र । त्वायवः । अभि । प्र । नोनुमः । वृषन् । विद्धि । तु । अस्य । नः । वसो ॥१३२॥

Samveda - Mantra Number : 132
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) परमैश्वर्य वाले इन्द्र ! वा राजन् ! (वयम्) हम (त्यायवः) तेरा यजन चाहते हुए (त्वा) तेरा (अभि-प्र-नोनुमः) सब ओर से प्रशस्त वर्णन करते हैं। (वृषन्) जलों वा कामनाओं के वर्षक ! (वसो) बसाने वाले ! (अस्य) इसको (विद्धि) प्राप्त हो वा जान॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७।४।३५॥ ३।२।१७० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
सायणाचार्य ने “नु” पद व्याख्यात किया है परन्तु मूल में नहीं पाया जाता॥ ऋ० १०।१३३।६ में “वयमिन्द्र त्वायवः” केवल इतनी समानता है॥५॥