Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1317

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वसुर्भारद्वाजः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प꣣र्ज꣡न्यः꣢ पि꣣ता꣡ म꣢हि꣣ष꣡स्य꣢ प꣣र्णि꣢नो꣣ ना꣡भा꣢ पृथि꣣व्या꣢ गि꣣रि꣢षु꣣ क्ष꣡यं꣢ दधे । स्व꣡सा꣢र꣣ आ꣡पो꣢ अ꣣भि꣢꣫ गा उ꣣दा꣡स꣢र꣣न्त्सं꣡ ग्राव꣢꣯भिर्वसते वी꣣ते꣡ अ꣢ध्व꣣रे꣢ ॥१३१७॥

प꣣र्ज꣡न्यः꣢ । पि꣣ता꣢ । म꣣हिष꣡स्य꣢ । प꣣र्णि꣡नः꣢ । ना꣡भा꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । गि꣣रि꣡षु꣢ । क्ष꣡य꣢꣯म् । द꣣धे । स्व꣡सा꣢꣯रः । आ꣡पः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । गाः । उ꣣दा꣡स꣢रन् । उ꣡त् । आ꣡स꣢꣯रन् । सम् । ग्रा꣡व꣢꣯भिः । व꣣सते । वीते꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ ॥१३१७॥

Mantra without Swara
पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे । स्वसार आपो अभि गा उदासरन्त्सं ग्रावभिर्वसते वीते अध्वरे ॥

पर्जन्यः । पिता । महिषस्य । पर्णिनः । नाभा । पृथिव्याः । गिरिषु । क्षयम् । दधे । स्वसारः । आपः । अभि । गाः । उदासरन् । उत् । आसरन् । सम् । ग्रावभिः । वसते । वीते । अध्वरे ॥१३१७॥

Samveda - Mantra Number : 1317
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अब यह बताया जाता है कि सोम का होम करने पर पुनः सोम की उत्पत्ति किस के साथ, किस स्थान में, किस से, किस रूप में होती है — (अध्वरे) यज्ञ (वीते) बीत चुकने पर (महिषस्य) बड़े (पर्णिनः) पत्तों वाले सोम का (पर्जन्यः) मेघ (पिता) जनक होता है, और (पृथिव्याः) भूमि के (नाभा) नाभि = मध्य (गिरिषु) पर्वतों में (क्षयम्) निवास को [सोम] (दधे) धारण करता है, तथा (स्वसारः आपः) भगिनी के तुल्य जल (गाः) भूमियों को (अभि) अभिव्याप्त करके (उदासरन्) उच्चभाव से सब ओर जाते हैं और तब सोम (ग्रावभिः) पत्थरों के साथ (सं वसते) वास करता है। अर्थात् यज्ञ से मेघ वर्षता है और वह जल तथा सोम को पर्वतों में वर्षा कर वहां सोम ओषधिराज को उपजाता है, क्योंकि सोम और अप् (स्त्रीलिंग) = जलों का उत्पन्न करने वाला एक मेघ ही है, इस लिये सोम और जल का मेघ पिता कहा गया और सोम की बहन = भगिनियें अप् (जल) कही गई। इस प्रकार सोम पर्वत प्रदेशों में वर्षा ऋतु में पत्ते वाली बूंटी के रूप में पत्थरों में रहता है। ढूंढिये तो पाइयेगा॥
Footnote
ऋ० ९। ८२। ३ के दो पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥