Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1315

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प꣡रि꣢ स्वा꣣न꣡श्चक्ष꣢꣯से देव꣣मा꣡द꣢नः꣣ क्र꣢तु꣣रि꣡न्दु꣢र्विचक्ष꣣णः꣢ ॥१३१५

प꣡रि꣢꣯ । स्वा꣣नः꣢ । च꣡क्ष꣢꣯से । दे꣣वमा꣡द꣢नः । दे꣣व । मा꣡द꣢꣯नः । क्र꣡तुः꣢꣯ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ ॥१३१५॥

Mantra without Swara
परि स्वानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः ॥१३१५

परि । स्वानः । चक्षसे । देवमादनः । देव । मादनः । क्रतुः । इन्दुः । विचक्षणः । वि । चक्षणः ॥१३१५॥

Samveda - Mantra Number : 1315
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्वानः) अभिषव किया जाता हुआा (देवमादनः) देवों का हृष्टिकास्क (क्रतुः) यज्ञ का स्वरूप (इन्दुः) गीला सोम (विचक्षणः) आंखों का हितकारी है, सो (चक्षसे) दृष्टिप्रसादार्थ (परि) चारों ओर से फैलता है॥
Footnote
ऋग्वेद ९। १०७। ३ में भी॥