Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 131

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡पि꣢बत्क꣣द्रु꣡वः꣢ सु꣣त꣡मिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡स्र꣢बाह्वे । त꣡त्रा꣢ददिष्ट꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् ॥१३१॥

अ꣡पि꣢꣯बत् । क꣣द्रु꣡वः꣢ । क꣣त् । द्रु꣡वः꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । स꣣ह꣡स्र꣢बाह्वे । स꣣ह꣡स्र꣢ । बा꣣ह्वे । त꣡त्र꣢꣯ । अ꣣ददिष्ट । पौँ꣡स्य꣢꣯म् । ॥१३१॥

Mantra without Swara
अपिबत्कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाह्वे । तत्राददिष्ट पौꣳस्यम् ॥

अपिबत् । कद्रुवः । कत् । द्रुवः । सुतम् । इन्द्रः । सहस्रबाह्वे । सहस्र । बाह्वे । तत्र । अददिष्ट । पौँस्यम् । ॥१३१॥

Samveda - Mantra Number : 131
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) वृष्टिकर्त्ता देव वा राजा (सहस्रदाह्वे) बहुत बाधने वाले मेघ वा शत्रु के लिए (कद्रुवः) पीतवर्ण सोमौषधि से (सुतम्) निचोड़े हुए सोमरस को (अपिबत्) पीता है (तत्र) उसमें (पौंस्यम्) पौरुष को (आददिष्ट) प्रकाशित करता है॥
जब कि सोम के पत्ते पीले हो जावें अर्थात् पक जावें तब सोमरस निचोड़ना चाहिये। फिर उसके होम द्वारा अन्तरिक्ष स्थान इन्द्र देवविशेष को पहुँचाने से मेघ जो असंख्य बाहु फैलाये गगनमण्डल को घेर रहा है, उसे इन्द्र गिराकर वर्षाता है, अथवा सोमादि वृक्ष वनस्पति जब तक कच्चे रहते हैं तब तक तो इन्द्र उनका रस बढ़ाता है और जब पक कर पीले [कटु] हो जाते हैं तब उनका रस खींच लेता है वा पी लेता है। उसी से वर्षा होती है। राजा भी पक्का सोमरस पान करके उसके बल से पुरुषार्थं करे और ‘सहस्र’ असंख्यात शत्रु-बाधाओं का दलन करे।
Footnote
सायणाचार्य “कद्र” पद से ऋषिविशेष का और विवरणकार कश्यप की स्त्री का ग्रहण करते हैं। हम कहते हैं कि निघण्टु में कद्रुपद का कुछ भी अर्थ न लिखा हो, यदि ये दोनों भाष्यकार अमरकोष धीवर्ग श्लोक १६ को भी देख लिये होते तो “पीतवर्णं=कद्रु” कहाता है, यह जान लेते। और परस्पर विवाद न होता। प्रथम तो इतिहास के प्रतिपादक समस्त अर्थाभास वेदों का अपौरुषेयत्व नष्ट करते हैं, फिर ज्वालाप्रसाद भार्गव जी की विचित्रता देखने योग्य है। वह कहते हैं कि “(इन्द्रः) परशुराम रूप परमेश्वर ने (सहस्त्रबाह्वे) सहस्रबाहु नामक राजा के लिये (कद्रवः) कामवृक्ष देह के (सुतम्) अभिषुत क्रोध को (अपिबत्) मन में धारण किया” इत्यादि। अब विचारना चाहिये कि इनके मत में सायणाचार्य का विशेष १। और विवरणकार जो कहते हैं कि “सहस्र बहुत का नाम है [निघं० ३।१] बाहुशब्द से भी अवयव से समुदाय का सम्बन्ध होने से कर्त्ता का ग्रहण है। अर्थात् बहुत हैं कर्ता जिसमें उस सत्र = यज्ञविशेष का नाम सहस्रबाहु है” इत्यादि। इससे विरोध २। वेद की अपौरुषेयता का भंग ३। इन्द्र पद से परशुराम अर्थ में प्रमाण न होना ४। कद्रु पद से देह अर्थ लेने में प्रमाणरहितता ५। सुतम् का प्रकरणानुकूल निचोड़ सोम अर्थ का त्याग और निष्प्रमाण क्रोध में अर्थ लेना ६। तथा प्रकरणागत राजाद्यर्थ का त्याग ७वां दोष है॥ ऋग्वेद ८।४५।२६ में “अत्रादेदिष्ट” इतना पाठ में अन्तर है॥