Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1309

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣣जा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ पि꣡प्र꣢तः꣣ प्र꣡ यद्भर꣢꣯न्त꣣ व꣡ह्न꣢यः । वि꣡प्रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ वा꣡ह꣢सा ॥१३०९॥

प्र꣣जा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पि꣡प्र꣢꣯तः । प्र । यत् । भ꣡र꣢꣯न्त । व꣡ह्न꣢꣯यः । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । ऋत꣡स्य꣢ । वा꣡ह꣢꣯सा ॥१३०९॥

Mantra without Swara
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः । विप्रा ऋतस्य वाहसा ॥

प्रजाम् । प्र । जाम् । ऋतस्य । पिप्रतः । प्र । यत् । भरन्त । वह्नयः । विप्राः । वि । प्राः । ऋतस्य । वाहसा ॥१३०९॥

Samveda - Mantra Number : 1309
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ऋतस्य) यज्ञ की (प्रजाम्) प्रजारूप इन्द्र = वायु को (यत्) जबकि (पिप्रतः) आकाश में पूर्ण करते हुए (वह्नयः) सूर्य किरणें वा होमकुण्डस्थ अग्निज्वालायें (प्र भरन्त) मरती हैं तब (विप्राः) ऋत्विज् ब्राह्मण लोग (ऋतस्य) यज्ञ के (वाहसा) पहुँचाने वाले मन्त्र पाठ के साथ यजन आरम्भ करते हैं। जिन मन्त्रों द्वारा मनुष्य को यज्ञ का प्रकार और उसका फल ज्ञात हुआ, वे मन्त्र यज्ञ के पहुंचाने वाले समझने चाहियें।
Footnote
ऋग्वेद ८। ६। २ में भी॥