Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 130

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रं꣢ व꣣यं꣡ म꣢हाध꣣न꣢꣫ इन्द्र꣣म꣡र्भे꣢ हवामहे । यु꣡जं꣢ वृ꣣त्रे꣡षु꣢ व꣣ज्रि꣡ण꣢म् ॥१३०॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । व꣣य꣢म् । म꣣हाधने꣣ । महा । धने꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् अ꣡र्भे꣢꣯ । ह꣣वामहे । यु꣡ज꣢꣯म् । वृ꣣त्रे꣡षु꣢ । व꣣ज्रि꣡ण꣢म् ॥१३०॥

Mantra without Swara
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे । युजं वृत्रेषु वज्रिणम् ॥

इन्द्रम् । वयम् । महाधने । महा । धने । इन्द्रम् अर्भे । हवामहे । युजम् । वृत्रेषु । वज्रिणम् ॥१३०॥

Samveda - Mantra Number : 130
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वयम्) हम प्रजायें (महाधने) बड़ी लड़ाई में (इन्द्रम्) परमेश्वर वा राजा को (हवामहे) पुकारें तथा (अर्भे) छोटी [लड़ाई] में भी (वृत्रेषु, वज्रिणम्) रोकने वालों में, दण्डधारी (युजम्) सावधान (इन्द्रम्) ईश्वर वा राजा को [पुकारें]॥
जहाँ अल्प वा महान् संग्राम हो जहां प्रजा को योग्य है कि दुष्ट शत्रुओं के निवारक परमात्मा वा राजा की पुकार करें॥
“महाधन शब्द यद्यपि सङ्ग्रामवाची है तथापि यहाँ भारी धन से अभिप्राय है” इस प्रकार के सायणाचार्य के लेख पर सामश्रमी सत्यव्रत जी टिप्पणी में बूझते हैं कि “इसमें ज्ञापक क्या है ?”
Footnote
निघं० २।१७॥३।२॥ अष्टाध्यायी ६।१।३२॥६। १।३४॥ शथपथ ८।२।४।१० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १।७।५ में भी॥