Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 13

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा जा꣣म꣢यो꣣ गि꣢रो꣣ दे꣡दि꣢शतीर्हवि꣣ष्कृ꣡तः꣢ । वा꣣यो꣡रनी꣢꣯के अस्थिरन् ॥१३॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । जाम꣡यः꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । दे꣡दि꣢꣯शतीः । ह꣣विष्कृ꣡तः꣢ । ह꣣विः । कृ꣡तः꣢꣯ । वा꣣योः꣢ । अ꣡नी꣢꣯के । अ꣣स्थिरन् ॥१३॥

Mantra without Swara
उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः । वायोरनीके अस्थिरन् ॥

उप । त्वा । जामयः । गिरः । देदिशतीः । हविष्कृतः । हविः । कृतः । वायोः । अनीके । अस्थिरन् ॥१३॥

Samveda - Mantra Number : 13
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम ऋचा से “अग्ने” यह अनुवृत्ति आती है। हे उपासनीय देव ! (हविष्कृतः) भक्ति करने वाले की (जामयः) स्त्रियों के समान (दे-देशतीः) अत्यन्त त्याग वाली (गिरः) वाणी, (वायोः, अनीके) वायु के, मण्डल में (त्वा) आप का (उप, अस्थिरन्) उपस्थान करती हैं।
अर्थात् हे जगत्पति ! आप के भक्तों की वाणी जो यज्ञादि कर्मों में अत्यन्त दक्षिणादि द्वारा दान वा त्याग वा विरक्त भाव को उच्चारती हैं उन वाणियों ने इस वायुमण्डल को भर रक्खा है, और मानो वे वाणी वायुमण्डल में आपका उपस्थान कर रही हैं। यथार्थ में जी परमात्मा की भक्ति की ओर झुकते हैं उन्हें क्रमश: सांसारिक धनादि पदार्थों में वैराग्य भाव उत्पन्न होता जाता है, और वे उन धनादि पदार्थों का सत्पात्रों में दान करने के लिये प्रायः त्याग किया करते हैं और करना चाहिये। तथा तदनुकूल वाणी भी उनकी वैसा ही दानादि शब्दों का प्रयोग करती हैं। और जितना धनादि का त्याग करती जाती हैं उतना ही परमात्मा का उपस्थान [सामीप्य] करती जाती हैं।
भौतिक पक्ष में—हे अग्ने ! (हविष्कृतः) यज्ञ करने वाले की (जामयः) स्त्रियों के समान (देदेशतीः) अत्यन्त त्यागशील (गिरः) वाणियें (वायोः, अनीके) वायुमण्डल में (त्वा) तेरे (उप) समीप (अस्थिरन्) ठहरती हैं।
अर्थात् यज्ञकर्त्ताओं को चाहिये कि वाणी से दान वा त्याग का प्रयोग करें जैसा कि प्रति मन्त्र के अन्त में हवन करने वाले “स्वाहा” बोलते हैं, वा “इदन्न मम” इत्यादि बोलते हैं। उन स्वाहा आदि का अर्थ दान त्याग वा छोड़ना आदि है। वे वाणियें वायुमण्डल में अग्नि के समीप गूंजती हुई वायुमण्डल को अलंकृत करें। इस मन्त्र से यह भी विज्ञान का अंश जतलाया गया है कि वाणी आग्नेय है और वह वायु के आधार पर एक मनुष्यादि से उच्चारण की हुई दूसरे मनुष्यादि के श्रोत्र द्वारा उसे प्राप्त होती है॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३।४।६॥ १।३।२३ संस्कृतभाष्य पृष्ठ ३७१ से देखिये। ऐसी ही ऋचा ऋग्वेद (८।१।१३) में आई है॥