Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1284

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः (प्रथमपादः) नृमेध आङ्गिरसः (शेषास्त्रयः पादाः) Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣡ सूर्य꣢꣯मरोचय꣣त्प꣡व꣢मानो꣣ अ꣢धि꣣ द्य꣡वि꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣢ मत्स꣣रो꣡ मदः꣢꣯ ॥१२८४

एषः꣢ । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣रोचयत् । प꣡व꣢꣯मानः । अ꣡धि꣢꣯ । द्य꣡वि꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । म꣣त्सरः꣢ । म꣡दः꣢꣯ ॥१२८४॥

Mantra without Swara
एष सूर्यमरोचयत्पवमानो अधि द्यवि । पवित्रे मत्सरो मदः ॥१२८४

एषः । सूर्यम् । अरोचयत् । पवमानः । अधि । द्यवि । पवित्रे । मत्सरः । मदः ॥१२८४॥

Samveda - Mantra Number : 1284
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(एषः) यह (मत्सरः) गाढा (मदः) हर्षकारक (पवमानः) सोम (पवित्रे) पवित्र (द्यवि अधि) द्युलोक में (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयत्) प्रकाशित करता है।
आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक भेद से ३ प्रकार का सूर्य है। अभिषुत किया, हवन किया और पिया हुआ सोम उन तीनों प्रकार से सूर्य को रुचि देता है। वृष्टि का कारण जो सूर्याश है, वह सोम के हवन से ऐसी वृद्धि पाता है कि वर्षा करे, सोम के पीने से मानस सूर्य की रुचि बढ़ती है।
Footnote
ऋ० ९। २०। ५ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये और तदनुसार अर्थभेद है॥