Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1280

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रियमेध आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢ वा꣣जी꣢ हि꣣तो꣡ नृभि꣢꣯र्विश्व꣣वि꣡न्मन꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । अ꣢व्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति ॥१२८०॥

ए꣣षः꣢ । वा꣣जी꣢ । हि꣣तः꣢ । नृ꣡भिः꣢꣯ । वि꣣श्ववि꣢त् । वि꣣श्व । वि꣢त् । म꣡नसः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति ॥१२८०॥

Mantra without Swara
एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः । अव्यं वारं वि धावति ॥

एषः । वाजी । हितः । नृभिः । विश्ववित् । विश्व । वित् । मनसः । पतिः । अव्यम् । वारम् । वि । धावति ॥१२८०॥

Samveda - Mantra Number : 1280
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(एषः) यह (वाजी) बलवान् सोम (नृभिः) कर्म के नेता लोगों ऋत्विजों से (हितः) धारण किया हुआ (विश्ववित्) सब को मिलने वाला (मनसः) मन का (पतिः) पालन पोषण करने वाला है, सो यह (अव्यम्) ऊनी (वारम्) दशापवित्र को (विधावति) विविध प्रकार से जाता है। चन्द्रमा का उत्पत्ति वेद में समष्टि मन से वर्णन की है और सोमरस का चन्द्रमा से बहुत साधर्म्य है, इस लिये यहां व्यष्टिगत मन का भी सोमरस को पोषक बताना युक्त है॥
Footnote
ऋ० ९। २८। १ का पाठ संस्कृतभाष्य में देखिये॥