Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 128

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ न꣢ इन्द्रा꣣भ्या꣢३꣱दि꣢शः꣣ सू꣡रो꣢ अ꣣क्तु꣡ष्वा य꣢꣯मत् । त्वा꣢ यु꣣जा꣡ व꣢नेम꣣ त꣢त् ॥१२८॥

मा ꣢ । नः꣣ । इन्द्र । अभि꣢ । आ꣣दि꣡शः꣢ । आ꣣ । दि꣡शः꣢꣯ । सूरः꣢꣯ । अ꣣क्तु꣡षु꣢ । आ । य꣣मत् । त्वा꣢ । यु꣣जा꣢ । व꣣नेम । त꣢त् ॥१२८॥

Mantra without Swara
मा न इन्द्राभ्या३दिशः सूरो अक्तुष्वा यमत् । त्वा युजा वनेम तत् ॥

मा । नः । इन्द्र । अभि । आदिशः । आ । दिशः । सूरः । अक्तुषु । आ । यमत् । त्वा । युजा । वनेम । तत् ॥१२८॥

Samveda - Mantra Number : 128
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) परमात्मन् ! वा राजन् ! वा सूर्य ! (अक्तुषु) अज्ञानकालों में वा रात्रियों में (आ-विशः) चारों तरफ किसी दिशा की ओर से (सूरः) काम क्रोधादि शत्रु वा चौरादि वा अन्धकार (नः) हम लोगों को (मा, अभि, आयमत्) न, सामने, आवे [यदि आवे तो] (त्वा, युजा) तेरे, योग से (तत्) उस दुष्ट को (वनेम) हनन करें॥
परमेश्वर की कृपा से काम क्रोधादि शत्रुगण प्रथम तो हम पर आक्रमण ही नहीं कर सकते। यदि करें भी तो परमात्मा की सहायता से ध्वस्त कर सकते हैं। इसी प्रकार प्रथम तो राजा के प्रताप से दस्युप्रभृति दुष्ट प्रबलता ही नहीं कर सकते, यदि करें भी तो राजा की सहायता से प्रजा उनको नष्ट करें॥ तथा सूर्य के प्रकाश में प्रथम तो अन्धकार का प्रभाव ही नहीं हो सकता, यदि कदाचित् रात्रि आदि अन्धकारकाल में कुछ प्रभाव हो भी तो सूर्य की सहायता अर्थात् उससे उत्पन्न हुए प्राण वायुजन्य दीपकादि के प्रकाश से उस अन्धकार का नाश हो सकता है।
Footnote
निघण्टु १।७ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋ० ८।२।३१ में भी॥