Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 127

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भारद्वाजः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡ आन꣢꣯यत्परा꣣व꣢तः꣢ सु꣡नी꣢ती तु꣣र्व꣢शं꣣ य꣡दु꣢म् । इ꣢न्द्रः꣣ स꣢ नो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१२७॥

यः꣢ । आ꣡न꣢꣯यत् । आ꣣ । अ꣡न꣢꣯यत् । प꣣राव꣡तः꣢ । सु꣡नी꣢꣯ती । सु । नी꣣ति । तुर्व꣡श꣢म् । य꣡दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । सः । नः꣣ । यु꣡वा꣢꣯ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ ॥१२७॥

Mantra without Swara
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम् । इन्द्रः स नो युवा सखा ॥

यः । आनयत् । आ । अनयत् । परावतः । सुनीती । सु । नीति । तुर्वशम् । यदुम् । इन्द्रः । सः । नः । युवा । सखा । स । खा ॥१२७॥

Samveda - Mantra Number : 127
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः इन्द्रः) जो इन्द्र (परावतः) दूरवर्त्तियों को भी (यदुम) मनुष्यों को (सुनीती) सुन्दर नीति से (तुर्वशम्) समीप (आनयत्) ले आता है (सः युवा) वह, बली (नः, सखा) हमारा, मित्र हो॥
मनुष्यों की योग्य है कि जो बली इन्द्र अर्थात् देवविशेष वा राजा वा सूर्य वा परमेश्वर, उन मनुष्यादि को भी जो दूरवर्ती हैं वा अज्ञान में डूबे होने से दूर से हैं, वश में ले आता है वा कृपा करके उपासक बना लेता है, उसको अपना मित्र अर्थात् अनुकूल बनावें॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७।१।३९॥ निघण्टु २।१६॥ ३।२६॥ २। ३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
सायणाचार्य ने निघण्टु की उपेक्षा करके न जाने क्यों तुवंश और यदू नामक राजा लिख दिये, जिससे कि वेद की अपौरुषेयता के व्याघात के अतिरिक्त यह भी दोष आता है कि इतिहास ग्रन्थों में भी कहीं इन्द्र के साथ यदु और तुर्वश राजा की इस प्रकार की कथा कहीं नहीं सुनी जाती। पं० ज्वालाप्रसाद जी ने प्रमाणरहित यदु का अर्थ नररूपाऽवतार किया है॥ ऋग्वेद में भी (६।४५।१)॥३॥