Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 126

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्षश्रुतकक्षौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣢द꣣द्य꣡ कच्च꣢꣯ वृत्रहन्नु꣣द꣡गा꣢ अ꣣भि꣡ सू꣢र्य । स꣢र्वं꣣ त꣡दि꣢न्द्र ते꣣ व꣡शे꣢ ॥१२६॥

य꣢त् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । कत् । च꣣ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । उद꣡गाः꣢ । उ꣣त् । अ꣡गाः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । सू꣣र्य । स꣡र्व꣢꣯म् । तत् । इ꣣न्द्र । ते । व꣡शे꣢꣯ ॥१२६॥

Mantra without Swara
यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य । सर्वं तदिन्द्र ते वशे ॥

यत् । अद्य । अ । द्य । कत् । च । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । उदगाः । उत् । अगाः । अभि । सूर्य । सर्वम् । तत् । इन्द्र । ते । वशे ॥१२६॥

Samveda - Mantra Number : 126
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहन्) वृत्र अर्थात् जलों को रोकने वाले मेघ वा पाप के हन्ता ! (सूर्य) लोक विशेष ! वा परमेश्वर ! (अद्य) आज [ब्राह्मदिन में] (यत् कच्च) जो कुछ है (तत्) उसको (अभि, उदगाः) अभ्युदययुक्त करता है [इस से] (सर्वं, ते, वशे) सब, तेरे, वशवर्ती हैं।
परमात्मा और सूर्य के प्रकाश से समस्त ब्रह्माण्डवर्ती पदार्थ प्रकाशित हैं, इस लिये वे सब उसके धारण और आकर्षण से तदधीन हैं॥
Footnote
ऋग्वेद में भी ८। ९३।४२॥