Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 1254

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म꣡त्सि꣢ वा꣣यु꣢मि꣣ष्ट꣢ये꣣ रा꣡ध꣢से नो꣣ म꣡त्सि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣢त्सि꣣ श꣢र्धो꣣ मा꣡रु꣢तं꣣ म꣡त्सि꣢ दे꣣वा꣢꣫न्मत्सि꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣡ दे꣢व सोम ॥१२५४॥

म꣡त्सि꣢꣯ । वा꣣यु꣢म् । इ꣣ष्ट꣡ये꣢ । रा꣡ध꣢꣯से । नः꣣ । म꣡त्सि꣢꣯ । मि꣣त्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣡त्सि꣢꣯ । श꣡र्धः꣢꣯ । मा꣡रु꣢꣯तम् । म꣡त्सि꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । म꣡त्सि꣢꣯ । द्या꣡वा꣢꣯ । पृ꣣थि꣡वीइति꣢ । दे꣣व । सोम ॥१२५४॥

Mantra without Swara
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः । मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम ॥

मत्सि । वायुम् । इष्टये । राधसे । नः । मत्सि । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । पूयमानः । मत्सि । शर्धः । मारुतम् । मत्सि । देवान् । मत्सि । द्यावा । पृथिवीइति । देव । सोम ॥१२५४॥

Samveda - Mantra Number : 1254
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देव) दिव्यगुणयुक्त ! (सोम) सोम ! तू (नः) हमारे (राधसे) धन और (इष्टये) यज्ञ के लिये (वायुम्) साधारण वायु को (मत्सि) हृष्ट करता है, तथा (पूयमानः) शोध्यमान तू (मित्रावरुणा) प्राण और अपान को (मत्सि) बल देता है और (मारुतं, शर्धः) मरुतों = वायुभेदों के बल को (मत्सि) आप्यायित करता है और (देवान्) इन्द्रियों को (मत्सि) पुष्टि देता है और कहां तक कहा जावे — (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवी लोक अर्थात् पृथिवी आकाश के प्राणी अप्राणी सब पदार्थों की (मत्सि) हृष्टि-पुष्टि करता और तद्द्द्वारा हमारे धन धान्यादि बढ़ाता है॥
Footnote
ऋ० ९। ९७। ४२ में भी॥